मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के नवनियुक्त 30वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति अल्पेश यशवंत कोगजे ने औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण कर लिया है। राजधानी भोपाल स्थित राजभवन के सांदीपनि सभागार में आयोजित गरिमामय समारोह में राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण के साथ ही जस्टिस कोगजे ने मध्य प्रदेश न्यायपालिका के शीर्ष पद की संवैधानिक बागडोर संभाल ली है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा उनके नाम की संस्तुति की गई थी, जिसके परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने नियुक्ति की अधिसूचना जारी की थी।
समारोह में शासन और न्यायपालिका के शीर्ष प्रतिनिधि रहे मौजूद शपथ ग्रहण के औपचारिक कार्यक्रम में कार्यपालिका और न्यायपालिका का शीर्ष समन्वय देखने को मिला:
- मंत्रिमंडल और प्रशासन की उपस्थिति: समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, विधि एवं विधायी कार्य मंत्री, मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) सहित राज्य के कई वरिष्ठ मंत्री और भारतीय प्रशासनिक व पुलिस सेवा के आला अधिकारी मौजूद रहे।
- न्यायिक बिरादरी: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य पीठ (जबलपुर) तथा इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों के वरिष्ठ न्यायाधीशगण, महाधिवक्ता (Advocate General), स्टेट बार काउंसिल के प्रतिनिधि और वरिष्ठ अधिवक्तागण भी इस गरिमामयी अवसर के साक्षी बने।
जस्टिस ए. वाई. कोगजे की न्यायिक पृष्ठभूमि 16 जुलाई 1969 को जन्मे जस्टिस कोगजे देश के अनुभवी और निष्पक्ष न्यायविदों में गिने जाते हैं:
- शैक्षणिक और प्रारंभिक पृष्ठभूमि: उन्होंने महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी (MSU), बड़ौदा से विज्ञान (B.Sc.) और विधि (LL.B.) की डिग्री हासिल की और 1993 में गुजरात बार काउंसिल से वकालत का सफर शुरू किया।
- गुजरात हाईकोर्ट से शीर्ष पद तक: वर्ष 2016 में उन्हें गुजरात उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था, जिसके बाद 2018 में वे स्थायी न्यायाधीश बने। सिविल, क्रिमिनल और संवैधानिक मामलों में उनके पारदर्शी व त्वरित फैसलों ने न्यायिक क्षेत्र में उनकी विशिष्ट पहचान बनाई।
मध्य प्रदेश में न्याय प्रणाली का त्वरित क्रियान्वयन मुख्य चुनौती मुख्य न्यायाधीश का पद संभालने के बाद जस्टिस कोगजे के नेतृत्व में मध्य प्रदेश न्यायपालिका में कई सुधारों और प्राथमिकताओं पर काम होने की उम्मीद है:
- लंबित मुकदमों का निस्तारण: जिला अदालतों और हाईकोर्ट में वर्षों से लंबित आपराधिक व दीवानी मामलों के त्वरित निराकरण के लिए विशेष लोक अदालतों और फास्ट-ट्रैक बेंचों की सक्रियता बढ़ाना।
- अदालतों का डिजिटलीकरण: ई-कोर्ट प्रोजेक्ट, पेपरलेस फाइलिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हियरिंग सिस्टम को तहसील स्तर तक और अधिक प्रभावी बनाना।
- अधोसंरचना सुदृढ़ीकरण: प्रदेश की निचली अदालतों में बुनियादी सुविधाओं और आधुनिक न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करना ताकि आम नागरिकों को सुलभ, सस्ता और समयबद्ध न्याय मिल सके।
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