देश के दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में इन दिनों सियासी हलचलें अपने चरम पर हैं। महज 13 से 15 दिनों के भीतर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का मध्य प्रदेश में दूसरा दौरा तय होना और ठीक 48 घंटे बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का राजधानी भोपाल में विशाल महासम्मेलन के जरिए एंट्री लेना—यह महज एक संयोग नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के नए ध्रुवीकरण का सीधा संकेत है।
19 सितंबर को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के जरिए युवाओं और बेरोजगारी के मुद्दे पर ताल ठोकने के बाद राहुल गांधी अब 1 अक्टूबर को महाकोशल-विंध्य अंचल के बालाघाट पहुंच रहे हैं, जहां वे कुपोषण और बीमारियों से प्रभावित बैगा आदिवासी परिवारों के बीच अपनी जमीन तलाशेंगे। वहीं दूसरी ओर, बीजेपी के मुख्य रणनीतिकार अमित शाह 3 अक्टूबर को भोपाल के भेल (BHEL) दशहरा मैदान में 35 हजार से अधिक पशुपालकों के ‘राज्य स्तरीय गोपालक सम्मेलन’ और 255 करोड़ रुपये के उज्जैन डेयरी प्लांट सहित कई मेगा विकास परियोजनाओं के लोकार्पण के जरिए कांग्रेस के हर वार की धार कुंद करने का खाका तैयार कर चुके हैं।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—क्या मध्य प्रदेश देश की भावी राजनीति और सामाजिक समीकरणों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला (Episenter) बन चुका है?
राहुल गांधी की रणनीति: युवा आक्रोश से लेकर आदिवासी अस्मिता तक
कांग्रेस के लिए मध्य प्रदेश लंबे समय से एक कठिन चुनौती रहा है, लेकिन राहुल गांधी की हालिया सक्रियता दर्शाती है कि पार्टी अब ‘मिशन 2028’ और राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत-सामाजिक विमर्श को धार देने के लिए मप्र को फ्रंटलाइन पर रख रही है:
- इंदौर में युवाओं को साधा: सितंबर के तीसरे हफ्ते में इंदौर पहुंचे राहुल गांधी ने सीधे छात्र-छात्राओं और प्रतियोगी परीक्षार्थियों से संवाद किया। नर्सिंग घोटाले, पटवारी भर्ती विवाद और पेपर लीक के मामलों को उठाकर उन्होंने राज्य के पढ़े-लिखे युवाओं में पैठ बनाने की कोशिश की।
- बालाघाट में आदिवासी कार्ड: 1 अक्टूबर को राहुल का बालाघाट (बैहर-बिरसा) दौरा अत्यंत रणनीतिक है। यहां बैगा आदिवासियों के बच्चों की असामयिक मौतों के मुद्दे पर सीधे ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर वे न केवल राज्य की स्वास्थ्य व पोषण व्यवस्था पर सवाल दागेंगे, बल्कि 47 एसटी (ST) आरक्षित विधानसभा सीटों वाले राज्य में आदिवासियों को कांग्रेस के पाले में लामबंद करने का राष्ट्रीय संदेश देंगे।
अमित शाह का काउंटर-स्ट्रोक: ग्रामीण आर्थिकी, हिंदुत्व और ओबीसी-गोपालक वोट बैंक
कांग्रेस के हमलों को भांपते हुए भाजपा ने भी अपनी पारंपरिक किलेबंदी को अभेद्य बनाने का काउंटर-प्लान तैयार किया है:
- गोपालक सम्मेलन के जरिए बड़ा सामाजिक समीकरण: 3 अक्टूबर को भोपाल में आयोजित होने वाला गोपालक महासम्मेलन केवल एक सरकारी आयोजन नहीं है। दूध उत्पादकों, पशुपालकों और ग्रामीण कृषक समाज को साधकर भाजपा यादव समुदाय (जो मप्र में सीएम मोहन यादव के चेहरे से जुड़ा है) और समग्र ओबीसी वोट बैंक को सीधा संदेश देना चाहती है।
- दुग्ध क्रांति और विकास की सौगातें: अमित शाह उज्जैन में आधुनिक डेयरी प्लांट, भोपाल वेस्टर्न बायपास सहित हजारों करोड़ की आधारभूत ढांचागत परियोजनाओं का भूमिपूजन करेंगे। भाजपा का नैरेटिव साफ है—’कांग्रेस समस्याओं पर राजनीति करती है, जबकि भाजपा विकास और आजीविका के ठोस समाधान देती है।’
- संगठनात्मक कसावट: नए प्रदेश प्रभारी बिप्लब कुमार देब की ताजपोशी और अमित शाह के आगमन से पहले बूथ स्तर तक पार्टी मशीनरी को चुनावी मोड में झोंक दिया गया है।
क्यों मप्र बन रहा है राष्ट्रीय राजनीति का एपिसेंटर?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मध्य प्रदेश को इस समय दोनों प्रमुख दल देश की नब्ज मापने का बैरोमीटर मान रहे हैं:
- सीधा द्विदलीय मुकाबला (Direct Face-off): उत्तर प्रदेश या बिहार की तरह यहां कोई तीसरा मजबूत क्षेत्रीय दल नहीं है। यहां बनने वाला कोई भी नैरेटिव सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी बनाम कांग्रेस की आमने-सामने की लड़ाई का पैमाना बनता है।
- आदिवासी (ST) और ओबीसी (OBC) की निर्णायक आबादी: देश में इस समय जारी ‘जातिगत जनगणना’ और ‘सामाजिक न्याय’ की बहस का सबसे बड़ा आधार मध्य प्रदेश है। यहां 21% से अधिक आदिवासी और 50% के करीब ओबीसी आबादी है। राहुल जहां सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों के सवाल खड़े कर रहे हैं, वहीं भाजपा कल्याणकारी योजनाओं (लाडली बहना, किसान सम्मान, मुफ्त रजिस्ट्री) के जरिए इस वर्ग को मजबूती से बांधे हुए है।
- 2028 का रिहर्सल या 2029 का ब्लूप्रिंट: लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा ने मप्र की सभी 29 सीटें जीतकर क्लीन स्वीप किया था। कांग्रेस उस मनोवैज्ञानिक दबाव को तोड़कर यह साबित करना चाहती है कि वह जमीन पर जिंदा है, जबकि भाजपा किसी भी हाल में अपने सबसे मजबूत गढ़ में विपक्ष को 1 इंच जमीन भी देने को तैयार नहीं है।
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