मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने आम और खास नागरिकों के बीच पुलिसिया रवैये के फर्क को एक बार फिर उजागर कर दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के एक करीबी परिचित का मोबाइल फोन गुम होने के बाद अब शहर के कई थानों की पुलिस और आला अधिकारी उसकी तलाश में दिन-रात एक किए हुए हैं।
हैरानी की बात यह है कि घटना के तुरंत बाद जब पीड़ित शिकायत लेकर थाने पहुंचा, तो स्थानीय पुलिस ने हमेशा की तरह औपचारिकता दिखाते हुए न तो मामले को गंभीरता से लिया और न ही प्राथमिकी (FIR) दर्ज की।
सीएम हाउस से घंटी बजते ही मचा हड़कंप पीड़ित ने थाने से कोई मदद न मिलने पर सीधे मुख्यमंत्री निवास (CM House) से संपर्क साधा। जैसे ही मुख्यमंत्री कार्यालय से इंदौर पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को फोन घनघनाया, पुलिस महकमे में अफरा-तफरी मच गई।
- मैदान में उतरे आला अफसर: जो पुलिस सामान्य गुमशुदगी बताकर पल्ला झाड़ रही थी, उसी पुलिस कमिश्नरेट के पुलिस कमिश्नर (CP) और पुलिस उपायुक्त (DCP) स्तर के अधिकारी तुरंत हरकत में आ गए।
- कई थानों की टीमें जुटीं: आनन-फानन में मोबाइल की लोकेशन ट्रेस करने के लिए साइबर सेल को एक्टिव किया गया और कई थानों के बल को संभावित इलाकों में सर्चिंग के लिए दौड़ा दिया गया।
आम जनता में उठ रहे सवाल इस वीआईपी तत्परता ने एक बार फिर पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों और विपक्षी हलकों में चर्चा है कि जहां आम नागरिकों के चोरी या गुम हुए हजारों मोबाइल की शिकायतें थानों में धूल फांकती रहती हैं और मामूली सनहा (आवेदन) दर्ज कर उन्हें लौटा दिया जाता है, वहीं ‘सीएम के परिचित’ का टैग लगते ही पूरी कमिश्नरी जांच में झोंक दी गई।
फिलहाल पुलिस अधिकारी सर्विलांस और मुखबिर तंत्र के जरिए उस गुमशुदा मोबाइल को बरामद करने की पूरी जद्दोजहद में जुटे हैं। इंदौर और मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी हर बेबाक और प्रामाणिक (Authentic) इनसाइड स्टोरी के लिए हमारी वेबसाइट के साथ जुड़े रहें।












