सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से वकीलों में मचा हड़कंप! सीनियर एडवोकेट्स पर अचानक लगा दी यह बड़ी रोक; अब गलती की तो नपेगा लाइसेंस; कोर्ट रूम से लेकर चैंबर तक सब कुछ बदल गया, आदेश पढ़ते ही उड़े लीगल दिग्गजों के होश
नई दिल्ली (Authentic News विधिक डेस्क): देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट के गलियारों से एक ऐसा ऐतिहासिक और सख्त फैसला निकलकर सामने आया है, जिसने देश के सबसे रसूखदार और नामचीन वकीलों के पसीने छुड़ा दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं (Senior Advocates) के विशेषाधिकारों और उनके कोर्ट में पेश होने के पुराने ढर्रे पर एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी है, जिसकी कल्पना शायद किसी सीनियर वकील ने नहीं की थी।
अदालत ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि वरिष्ठता का तमगा किसी भी नियम से ऊपर नहीं है और अगर अब किसी ने इन सख्त बंदिशों को तोड़ा, तो न केवल उनकी वरिष्ठता छीनी जा सकती है, बल्कि अनुशासनात्मक कार्रवाई भी तय है।
आखिर किस बात पर लगी पूरी रोक? जानिए अंदर की कहानी
सुप्रीम कोर्ट ने बार और बेंच की मर्यादा को बनाए रखने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं के तौर-तरीकों पर बड़ा चाबुक चलाया है:
- बिना जूनियर या AoR के सीधे पैरवी पर सख्त रोक: शीर्ष अदालत ने दोहराया है कि कोई भी वरिष्ठ अधिवक्ता किसी भी मामले में अकेले सीधे पेश नहीं हो सकता। उनके साथ एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) या जूनियर वकील का होना अनिवार्य है।
- सीधे मुवक्किल से केस लेने और वकालतनामा साइन करने पर पाबंदी: वरिष्ठ वकील अब किसी मुवक्किल से सीधे तौर पर केस फाइल नहीं करवा सकते और न ही वकालतनामा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। उन्हें केवल निर्देश (Brief) के आधार पर बहस करने का अधिकार है।
- अदालत में अनावश्यक मेंशनिंग और दबाव बनाने पर कड़ा रुख: अक्सर यह देखा गया है कि मामलों को प्राथमिकता पर लिस्ट कराने के लिए सीनियर वकीलों के रसूख का सहारा लिया जाता है। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस अनैतिक परंपरा पर गहरी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया कि नियम सभी के लिए एक समान हैं।
क्यों उठाना पड़ा देश की सबसे बड़ी अदालत को यह कदम?
अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि पिछले कुछ समय से न्याय व्यवस्था के भीतर एक असंतुलन देखने को मिल रहा था:
- युवा और नए वकीलों के अधिकारों का हनन: वरिष्ठ वकीलों के बढ़ते दखल और विशेषाधिकारों के दुरुपयोग के चलते युवा वकीलों और जूनियर बार के सदस्यों को अदालत में अपनी बात रखने का पर्याप्त मंच नहीं मिल पा रहा था।
- अदालती समय की बर्बादी: बिना उचित ब्रीफ और वकालतनामे के केवल चेहरे के दम पर तारीख लेने या केस को प्रभावित करने की प्रवृत्ति पर अदालत ने कड़ा एतराज जताया।
- बार काउंसिल के कड़े नियम: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता का पद एक गरिमापूर्ण उपाधि है, न कि व्यावसायिक एकाधिकार का कोई लाइसेंस।
आदेश की अनदेखी पर होगी सीधी कार्रवाई
सर्वोच्च अदालत ने साफ संकेत दे दिया है कि आदेश का उल्लंघन करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं के खिलाफ अवमानना और एडवोकेट्स एक्ट के तहत लाइसेंस और सीनियर डेजिग्नेशन (वरिष्ठता का दर्जा) रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इस कड़े रुख के बाद सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश के सभी उच्च न्यायालयों के बार एसोसिएशन में जबरदस्त हलचल मच गई है।
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