अपराध की दुनिया और अदालती फैसलों के बीच मध्य प्रदेश की जेलों से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो किसी को भी भावुक कर सकती है। वर्तमान में प्रदेश की विभिन्न जेलों में करीब 110 मासूम बच्चे अपनी सजायाफ्ता या विचाराधीन (Under-trial) माताओं के साथ सलाखों के पीछे रहने को मजबूर हैं। कानूनन, महिला कैदियों के 6 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को उनके साथ रहने की अनुमति दी जाती है, जिसके कारण इन मासूमों का बचपन खेल के मैदानों के बजाय जेल की ऊंची दीवारों के साए में कट रहा है।
जेलों में बच्चों की परवरिश और मानसिक स्वास्थ्य पर असर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और समाजशास्त्रियों का मानना है कि जेल का माहौल इन बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालता है। हालांकि, जेल प्रशासन का दावा है कि इन बच्चों की बुनियादी जरूरतों का पूरा ध्यान रखा जाता है। मध्य प्रदेश जेल विभाग के नियमों के अनुसार, जेल परिसर के भीतर ही इन बच्चों के लिए पोषण आहार, नियमित चिकित्सा जांच और ‘क्रेच’ (बालवाड़ी) के माध्यम से शुरुआती अनौपचारिक शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। इसके बावजूद, बाहरी दुनिया से कटे होने के कारण इनका सामाजिक विकास प्रभावित हो रहा है।
6 साल के बाद बदल जाती है दुनिया नियमों के मुताबिक, जैसे ही इन बच्चों की उम्र 6 वर्ष पूरी होती है, उन्हें जेल के भीतर रखने की अनुमति नहीं होती। इसके बाद, यदि परिवार का कोई अन्य सदस्य बच्चे की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होता, तो कानूनन इन बच्चों को महिला एवं बाल विकास विभाग की मदद से सरकारी बाल गृहों (Child Care Institutions) या अनाथालयों में भेज दिया जाता है। जेल से अचानक इस तरह बाहर आने पर बच्चों को एक बिल्कुल नई और अनजान दुनिया से तालमेल बिठाने में भारी मानसिक संघर्ष करना पड़ता है। सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि इन बच्चों के भविष्य को सुधारने के लिए विशेष कस्टडी और पुनर्वास नीतियों पर और अधिक गंभीरता से काम किया जाना चाहिए।

















