मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Jabalpur High Court) ने एक दशक से अधिक पुराने पुलिस आरक्षक भर्ती-2013 मामले में अभ्यर्थियों के पक्ष में ऐतिहासिक और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने वर्ष 2015 में जारी की गई अंतिम चयन सूची (मेरिट लिस्ट) के विवादित और दोषपूर्ण हिस्से को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया है। इसके साथ ही खंडपीठ ने राज्य सरकार, गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय (PHQ) को निर्देशित किया है कि वे नियमों के दायरे में रहकर 12 सप्ताह (लगभग तीन माह) के भीतर संशोधित और पारदर्शी मेरिट सूची तैयार कर जारी करें।
इस फैसले से उन सैकड़ों योग्य अभ्यर्थियों में नई उम्मीद जगी है, जो भर्ती नियमों के कथित उल्लंघन, मनमाने नॉर्मलाइजेशन और रोस्टर विसंगतियों के चलते चयन सूची से बाहर हो गए थे।
क्या था पूरा विवाद? (2013 की भर्ती और 2015 की सूची में गड़बड़ी)
मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं/PEB) द्वारा वर्ष 2013 में पुलिस आरक्षकों के हजारों पदों के लिए भर्ती परीक्षा आयोजित की गई थी:
- 2015 में जारी हुई थी मेरिट: लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षण (फिजिकल टेस्ट) और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद पुलिस विभाग ने वर्ष 2015 में चयनित उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी की थी।
- नियमों की अनदेखी का आरोप: कई अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया था कि चयन सूची तैयार करते समय आरक्षण रोस्टर, हॉरिजॉन्टल आरक्षण (महिला/भूतपूर्व सैनिक/होमगार्ड) और अंकों के निर्धारण में भर्ती नियमों की अनदेखी की गई। अधिक अंक लाने वाले आरक्षित वर्ग के मेधावी उम्मीदवारों को अनारक्षित (General/Unreserved) श्रेणी में स्थान देने के बजाय उन्हें उनकी ही वर्ग सीमा में सीमित कर दिया गया, जिससे कई योग्य अभ्यर्थी मेरिट से बाहर हो गए।
- अदालत का दरवाजा खटखटाया: इस विसंगति को चुनौती देते हुए बड़ी संख्या में वंचित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ सहित इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों में अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर की थीं।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और सख्त निर्देश
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के कई फैसलों का हवाला देते हुए साबित किया कि 2015 की मेरिट सूची संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है:
- विवादित हिस्सा रद्द: हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की लंबी बहस सुनने के बाद 2015 की विवादित मेरिट सूची के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जहां नियमों की व्याख्या में गलती की गई थी।
- 12 हफ्ते की समय सीमा: अदालत ने पुलिस मुख्यालय को आदेश दिया कि वह सभी याचिकाओं में उठाए गए विधिक बिंदुओं, वास्तविक प्राप्तांकों और वैधानिक आरक्षण नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए 12 सप्ताह के भीतर पुनरीक्षित सूची (Revised List) तैयार करे।
- वर्तमान में कार्यरत पुलिसकर्मियों की स्थिति: अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि जो कर्मी पिछले कई वर्षों से सेवा दे रहे हैं, प्रशासनिक रूप से उनकी स्थिति पर न्यूनतम प्रतिकूल प्रभाव पड़े, लेकिन वास्तविक हकदार अभ्यर्थियों को उनका अधिकार और नियुक्ति अनिवार्य रूप से मिले।
बेरोजगार संघ व अभ्यर्थियों ने बताया ‘न्याय की जीत’
अदालत के इस फैसले के बाद वर्षों से अदालती लड़ाई लड़ रहे अभ्यर्थियों में खुशी की लहर दौड़ गई है:
- लंबे समय से कानूनी संघर्ष कर रहे उम्मीदवारों का कहना है कि 2015 की दोषपूर्ण सूची ने उनके जीवन के कई बहुमूल्य वर्ष छीन लिए।
- अभ्यर्थियों ने मांग की है कि गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय बिना किसी देरी या अपील के हाईकोर्ट के इस आदेश का 12 हफ्ते के भीतर अक्षरशः पालन सुनिश्चित करे, ताकि पात्र युवाओं को पुलिस बल में सेवा का अवसर मिल सके।
मध्य प्रदेश के विधिक निर्णयों, हाईकोर्ट की अहम सुनवाइयों, भर्ती परीक्षाओं के ताजा अपडेट्स और हर निष्पक्ष व प्रामाणिक (Authentic) रिपोर्टिंग के लिए जुड़े रहें हमारी वेबसाइट के साथ।












