मप्र में नौकरशाही पर फूटा हाई कोर्ट का कहर! छिंदवाड़ा कलेक्टर और CMHO पर सीधी FIR का खौफनाक आदेश; कांप उठी पूरी प्रशासनिक मशीनरी; अनुकंपा नियुक्ति की आड़ में हुआ था ऐसा खेल कि जज भी रह गए दंग, 30 दिन का मिला अल्टीमेटम
जबलपुर/छिंदवाड़ा (Authentic News विधिक व विशेष जांच डेस्क): मध्य प्रदेश के प्रशासनिक महकमे में उस वक्त भूचाल आ गया, जब जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एकल पीठ ने भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के एक मामले में ऐसा कड़ा चाबुक चलाया, जिसकी गूंज सीधे वल्लभ भवन (मंत्रालय) तक सुनाई दी है। हाई कोर्ट ने छिंदवाड़ा जिले में स्वास्थ्य विभाग के भीतर नियमों को ताक पर रखकर बांटी गई अवैध अनुकंपा नियुक्तियों (Illegal Compassionate Appointments) के गोरखधंधे पर कड़ा संज्ञान लेते हुए जिले के कलेक्टर और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के खिलाफ सीधे तौर पर एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश जारी कर दिया है।
अदालत ने सिर्फ जांच का दिखावा करने की बजाय पुलिस और जांच एजेंसियों को अल्टीमेटम देते हुए 30 दिनों के भीतर स्टेटस रिपोर्ट तलब कर ली है। एक साथ जिले के दो सबसे बड़े ओहदेदारों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने के इस आदेश ने पूरे मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अफसरों और स्वास्थ्य अधिकारियों के पैरों तले जमीन खिसका दी है।
बंद कमरों में बंटीं सरकारी नौकरियां: क्या था पूरा मामला?
अदालत के सामने पेश की गई याचिका में जो सनसनीखेज खुलासे हुए हैं, उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के पूरे चयन तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है:
- पात्रों का हक मारकर अपात्रों पर मेहरबानी: छिंदवाड़ा स्वास्थ्य विभाग में दिवंगत कर्मचारियों के आश्रितों को दी जाने वाली अनुकंपा नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली की गई। जो असली हकदार और पीड़ित परिवार थे, उनकी फाइलें वर्षों तक धूल फांकती रहीं, जबकि प्रभावशाली और अयोग्य चेहरों को बैकडोर से सरकारी कुर्सियां थमा दी गईं।
- दस्तावेजों में भारी फर्जीवाड़ा: प्राथमिक तथ्यों में यह बात सामने आई कि शैक्षणिक योग्यताओं, आश्रित होने के हलफनामों और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अपात्र अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर अफसरों ने बिना उचित जांच के हस्ताक्षर कर दिए।
- कलेक्टर और CMHO की संदिग्ध भूमिका: चयन समिति के मुखिया होने के नाते कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख के रूप में सीएमएचओ की सीधी जिम्मेदारी थी, लेकिन निगरानी रखने के बजाय मिलीभगत और घोर लापरवाही के गंभीर आरोप अदालत में साबित होते दिखे।
“भ्रष्टाचार पर कोई नरमी नहीं”: हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के माननीय न्यायाधीश ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताई:
- सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का निर्देश: अदालत ने दो टूक निर्देश दिया कि नियमों को ताक पर रखकर किए गए इस फर्जीवाड़े में शामिल जिम्मेदारों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत तत्काल प्राथमिकी दर्ज की जाए।
- 30 दिन की सख्त डेडलाइन: कोर्ट ने साफ कर दिया है कि इस मामले में किसी भी स्तर पर लीपापोती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जांच एजेंसी और पुलिस महानिदेशक स्तर को निर्देशित किया गया है कि अगले 30 दिनों के भीतर की गई कार्रवाई की सीलबंद रिपोर्ट अदालत की रजिस्ट्री में पेश की जाए।
मंत्रालय से लेकर छिंदवाड़ा कलेक्ट्रेट तक मचा हड़कंप
हाई कोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश आते ही प्रशासनिक गलियारों में खलबली मच गई है:
- मंत्रालय में आपात मंथन: भोपाल स्थित सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) और लोक स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आदेश की कानूनी बारीकियों का अध्ययन करने और आगे की कानूनी रणनीति (रिव्यू या डिवीजन बेंच में अपील) तय करने में जुट गए हैं।
- अन्य जिलों में भी जांच की आहट: छिंदवाड़ा के इस खुलासे के बाद यह माना जा रहा है कि प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी बीते वर्षों में हुई अनुकंपा नियुक्तियों की गोपनीय फाइलों की धूल झाड़ी जा सकती है, जिससे कई अन्य बड़े चेहरे भी जांच के रडार पर आ सकते हैं।
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