मध्य प्रदेश की राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाली भारतीय जनता पार्टी की महत्वाकांक्षी योजना ‘मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना’ अब कानूनी पचड़े में फंसती नजर आ रही है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में इस योजना को बंद कराने, मासिक सहायता राशि रोकने और राज्य के बढ़ते कर्ज को आधार बनाकर एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने राज्य शासन और महिला एवं बाल विकास विभाग को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब तलब किया है।
कोर्ट में याचिका दाखिल होते ही प्रदेश का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। न्यूज डिबेट्स (शह मात The Big Debate) से लेकर चौपालों तक सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है—“क्या कोर्ट वाकई लाडली बहना योजना को बंद कर देगी या यह महज एक राजनीतिक दांव है?”
याचिका में क्या हैं प्रमुख आपत्तियां और दलीलें?
ग्वालियर की पूर्व कांग्रेस पार्षद सुधा दुबे द्वारा अधिवक्ता अनिल कुमार मिश्रा के माध्यम से दाखिल इस याचिका में योजना के वित्तीय ढांचे और उद्देश्य पर कड़े सवाल उठाए गए हैं:
- सरकारी खजाने पर ₹22,000 करोड़ का सालाना बोझ: याचिका में कहा गया है कि सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपये का कर्ज ले रही है। सिर्फ एक योजना पर भारी-भरकम राशि खर्च करने से राज्य पर कर्ज और ब्याज का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
- ‘कैश ट्रांसफर’ बनाम ‘स्थायी रोजगार’: याचिकाकर्ता का तर्क है कि सीधे नकद राशि बैंक खाते में डालने से महिलाओं का स्थायी सशक्तीकरण नहीं हो रहा है। सरकार को ₹1500 बांटने के बजाय महिलाओं को कौशल विकास (Skill Development), तकनीकी प्रशिक्षण और स्थायी रोजगार के साधन मुहैया कराने चाहिए।
- चुनावी रेवड़ी का आरोप: याचिका में योजना को चुनावी लाभ के लिए जनता के टैक्स के पैसे का वितरण (Freebie Politics) करार दिया गया है और मांग की गई है कि जब तक सरकार अपनी वित्तीय देनदारियों का ब्योरा न दे, तब तक किस्तों के वितरण पर अंतरिम रोक लगाई जाए।
‘शह मात The Big Debate’: भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखा वाकयुद्ध
हाईकोर्ट के नोटिस के बाद प्रदेश के दोनों प्रमुख दलों के बीच तीखी जुबानी जंग शुरू हो गई है:
- भाजपा का पलटवार (कांग्रेस महिला विरोधी): भाजपा प्रवक्ताओं और मंत्रियों ने आरोप लगाया है कि याचिकाकर्ता कांग्रेस की पूर्व पार्षद हैं, जिससे साफ होता है कि कांग्रेस पर्दे के पीछे से लाडली बहनों का हक छीनने की साजिश रच रही है। भाजपा का कहना है कि 1.25 करोड़ बहनों के सम्मान और आर्थिक संबल को कांग्रेस ‘रेवड़ी’ बताकर उनका अपमान कर रही है। सरकार कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखेगी और योजना किसी भी कीमत पर बंद नहीं होगी।
- कांग्रेस की सफाई (सरकार की नीयत पर सवाल): कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह याचिका निजी हैसियत से लगाई गई है और इसका पार्टी के आधिकारिक रुख से कोई संबंध नहीं है। कांग्रेस ने उल्टे भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार खुद भारी कर्ज में डूबी है और नए पंजीयन पहले ही बंद कर चुकी है, जिससे लाखों पात्र बहनें लाभ से वंचित हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा वित्तीय संकट का ठीकरा अब कोर्ट और याचिकाओं पर फोड़कर पल्ला झाड़ना चाहती है।
क्या वाकई बंद हो सकती है लाडली बहना योजना? (कानूनी विश्लेषण)
कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, याचिका दाखिल होने और नोटिस जारी होने का मतलब योजना का बंद होना कतई नहीं है:
- अंतरिम रोक नहीं: हाईकोर्ट ने सरकार से केवल नीतिगत और वित्तीय स्थिति पर जवाब मांगा है; योजना की अगली किस्त के भुगतान पर कोई स्टे (रोक) नहीं लगाया है।
- नीतिगत फैसलों (Policy Decisions) में अदालत का दायरा: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने पूर्व में भी कल्याणकारी योजनाओं पर स्पष्ट किया है कि योजनाएं शुरू करना, उनकी पात्रता तय करना या राशि निर्धारित करना चुनी हुई सरकार का कार्यकारी विशेषाधिकार (Executive Domain) है। जब तक कोई योजना असंवैधानिक न हो, न्यायपालिका आमतौर पर वित्तीय कल्याणकारी योजनाओं को सीधे बंद करने का आदेश नहीं देती।
- वित्तीय संतुलन की समीक्षा: कोर्ट राज्य सरकार से यह जरूर पूछ सकती है कि विकास कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं के बीच वित्तीय संतुलन कैसे साधा जा रहा है।
मध्य प्रदेश की राजनीति, हाईकोर्ट के ताजा फैसलों, सरकारी योजनाओं के जमीनी असर और हर निष्पक्ष व प्रामाणिक (Authentic) रिपोर्टिंग के लिए जुड़े रहें हमारी वेबसाइट के साथ।












