मध्य प्रदेश में पेयजल संकट अब जानलेवा मोड़ ले रहा है। इंदौर की हृदयविदारक घटना, जहाँ दूषित पानी से 17 लोगों की जान चली गई, उसके बाद अब ग्वालियर के कई वार्डों (विशेषकर पुरानी छावनी और किला गेट इलाके) में स्थिति बेकाबू हो रही है। यहाँ नलों से जो पानी आ रहा है, वह न केवल पीने के अयोग्य है, बल्कि उसका उपयोग दैनिक कार्यों के लिए करना भी त्वचा रोगों को निमंत्रण देना है।
नहाने के बाद शरीर से आती है दुर्गंध
ग्वालियर के प्रभावित इलाकों के निवासियों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि नल से आने वाला पानी गटर के पानी जैसा काला और बदबूदार है। लोगों का कहना है कि यदि मजबूरी में इस पानी से नहा लिया जाए, तो साबुन लगाने के बाद भी शरीर से सीवेज (Sewage) जैसी तीखी बदबू आती है। बच्चों और बुजुर्गों में खुजली, रैशेज और अन्य चर्म रोगों (Skin Diseases) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
ग्वालियर नगर निगम की पाइपलाइनें कई जगहों पर जर्जर हो चुकी हैं। स्थानीय पार्षदों और जनता का आरोप है कि पेयजल की पाइपलाइनें ड्रेनेज (निकासी) की लाइनों से टकरा रही हैं या उनके भीतर से गुजर रही हैं। लीकेज के कारण गंदा पानी पेयजल में मिल रहा है।
समस्या की गंभीरता:
- बीमारियों का घर: दूषित पानी के कारण शहर के अस्पतालों में पीलिया (Jaundice), टाइफाइड और गैस्ट्रोएंटेराइटिस के मरीजों की संख्या में 30% तक की वृद्धि देखी गई है।
- दैनिक जीवन प्रभावित: लोग पीने के पानी के लिए निजी टैंकरों या आरओ (RO) प्लांट पर निर्भर हैं, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
- दुर्गंध का आलम: पानी में अमोनिया और अन्य दूषित पदार्थों की मात्रा इतनी अधिक है कि पानी को घर के भीतर स्टोर करने पर पूरे घर में बदबू फैल जाती है।
इंदौर की घटना से सबक लेने के बजाय, ग्वालियर का पीएचई (PHE) विभाग और नगर निगम एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पाइपलाइन नहीं बदली गई और शुद्ध पानी की सप्लाई सुनिश्चित नहीं की गई, तो वे उग्र आंदोलन करेंगे। स्वच्छ भारत मिशन के दावों के बीच, राज्य के प्रमुख शहरों में बुनियादी सुविधाओं का यह हाल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

















