हिंसा और उग्रवाद का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे लोगों की जिंदगी में कैसे सकारात्मक बदलाव आ रहा है, इसकी एक बेहद खूबसूरत और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। कभी दुर्गम जंगलों में हाथों में बंदूक थामकर व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले पूर्व विद्रोही मासा तामो और उनकी साथी जयमोती आज पूरी तरह बदल चुके हैं। हिंसा के आत्मघाती रास्ते को हमेशा के लिए अलविदा कहकर अब यह जोड़ा शांति और सम्मान के साथ अपनी खुद की किराना दुकान चला रहा है और समाज के सामने आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रहा है।
जंगलों की खौफनाक जिंदगी से तौबा एक समय था जब मासा तामो और जयमोती का नाम सुनते ही इलाकों में दहशत फैल जाती थी। सालों तक जंगलों में छिपकर रहने, गोलियों की गूंज और अनिश्चितता भरी जिंदगी जीने के बाद दोनों को यह अहसास हुआ कि हिंसा से कभी किसी का भला नहीं हो सकता। सरकार की पुनर्वास नीति (Rehabilitation Policy) से प्रेरित होकर उन्होंने न सिर्फ आत्मसमर्पण (Surrender) किया, बल्कि समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर मेहनत की कमाई से जीने का कड़ा संकल्प लिया।
किराना दुकान बनी नई जिंदगी का आधार हथियार डालने के बाद सरकार से मिली आर्थिक सहायता और अपनी जमा पूंजी से इस जोड़े ने एक छोटी सी किराना दुकान की शुरुआत की। आज उनकी दुकान पर सुबह से लेकर शाम तक ग्रामीणों की चहल-पहल रहती है। कभी उग्रवाद की बातें करने वाले मासा तामो अब ग्राहकों को सामान तौलते और हिसाब-किताब करते नजर आते हैं। दोनों का कहना है कि बंदूक की ताकत से सिर्फ तबाही मिलती है, लेकिन इस ईमानदारी की दुकान से उन्हें जो मानसिक शांति, सम्मान और सुकून मिला है, उसकी कोई कीमत नहीं है। यह कहानी उन भटके हुए युवाओं के लिए एक बड़ा सबक है जो आज भी हिंसा के रास्ते पर चल रहे हैं।
















