महाराष्ट्र में आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए चलाए जा रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR – Special Intensive Revision) कार्यक्रम को लेकर उपजा विवाद अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने मतदाता सूची से करोड़ों योग्य वोटरों के नाम गलत तरीके से काटे जाने (Wrongful Voter Exclusion) की आशंका जताने वाली एक जनहित याचिका पर आगामी 5 अक्टूबर 2026 को सुनवाई करने का निर्णय लिया है।
अधिवक्ता प्रकाश अंबेडकर ने सोमवार को कोर्ट में इस याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए मेंशन किया था। उन्होंने पीठ को बताया कि SIR प्रक्रिया की खामियों के कारण राज्य में लगभग 2.1 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। इसके बाद अदालत ने मामले को 5 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध कर लिया।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य चिंताएं और मांगें
यह रिट याचिका राज्य के दो निवासियों द्वारा दायर की गई है, जिसमें भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ की कार्यप्रणाली पर गंभीर कानूनी सवाल उठाए गए हैं:
- दस्तावेजों की अवैध मांग: याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के आधिकारिक निर्देशों में गणना (Enumeration) के दौरान दस्तावेजों को जमा करने का कोई नियम नहीं है। इसके बावजूद, बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) घर-घर जाकर नागरिकों से फॉर्म प्राप्त करते समय अवैध रूप से ‘सहायक दस्तावेजों’ (Supporting Documents) की मांग कर रहे हैं।
- पारदर्शिता का अभाव: याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वे SIR प्रक्रिया को पूरी तरह रोकना या चुनावी कार्यक्रम को बाधित करना नहीं चाहते हैं। इसके बजाय, वे इस अभियान के कानूनी आधार, अपनाई जा रही कार्यप्रणाली और इसके पीछे दर्ज किए गए कारणों को सार्वजनिक करने (पारदर्शिता) की मांग कर रहे हैं।
- नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग का नहीं: याचिका में मजबूत तर्क दिया गया है कि चुनाव आयोग केवल एक सीमित चुनावी मूल्यांकन कर सकता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की ‘नागरिकता’ का अंतिम रूप से निर्धारण नहीं कर सकता। यदि नागरिकता पर कोई संदेह है, तो मामला ‘नागरिकता अधिनियम, 1955’ के तहत सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने पूछा— ‘इसमें जल्दबाजी क्या है?’
सोमवार को जब अधिवक्ता प्रकाश अंबेडकर ने मामले की तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया, तो मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना की अगुवाई वाली पीठ ने उनसे सवाल किया, “इसमें इतनी जल्दबाजी क्या है?” इसके जवाब में अंबेडकर ने 2 करोड़ से अधिक मतदाताओं को बिना पुख्ता वजह के सूची से बाहर किए जाने की आशंका जताई। दलीलें सुनने के बाद अदालत ने इस संवेदनशील मामले को 5 अक्टूबर की कॉज लिस्ट में शामिल करने का निर्देश दिया।
इस याचिका में मुख्य रूप से यह गुहार लगाई गई है कि योग्य मतदाताओं के गलत तरीके से नाम काटे जाने पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट ‘सेफगार्ड्स’ (सुरक्षा उपाय) सुनिश्चित किए जाएं और जिन वैध मतदाताओं के नाम पहले ही हटा दिए गए हैं, उन्हें तुरंत बहाल (Restore) किया जाए।
महाराष्ट्र के विधिक फैसलों, चुनाव आयोग से जुड़ी अपडेट्स, हाईकोर्ट की अहम सुनवाइयों और हर निष्पक्ष व प्रामाणिक (Authentic) रिपोर्टिंग के लिए जुड़े रहें हमारी वेबसाइट के साथ।












