मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के राजनैतिक और व्यापारिक हलकों से एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता और रसूखदार बिल्डर नीलेश चौधरी का एक महत्वाकांक्षी 200 करोड़ रुपये का रियल एस्टेट (Mega Residential Project) प्रोजेक्ट कानूनी और राजनैतिक विवादों के दलदल में फंस गया है। इंदौर के एक प्राइम लोकेशन पर बन रहे इस आलीशान टाउनशिप और कमर्शियल हब को लेकर कई गंभीर विसंगतियों के आरोप लगे हैं, जिसके बाद प्रशासन से लेकर राजनैतिक गलियारों तक भारी हलचल मची हुई है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस पूरे मामले को लेकर मोहन यादव सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और इसे ‘सत्ता के संरक्षण में किया जा रहा बड़ा घोटाला’ करार दिया है। वहीं, मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन और नगर निगम की संयुक्त टीम ने शुरुआती जांच के आदेश दे दिए हैं।
क्या है पूरा मामला? क्यों उठे 200 करोड़ के प्रोजेक्ट पर सवाल?
राजनैतिक सूत्रों और रेवेन्यू (राजस्व) रिकॉर्ड से मिली जानकारी के अनुसार, यह पूरा विवाद मुख्य रूप से तीन बड़े बिंदुओं पर टिका हुआ है:
- 1. ग्रीन बेल्ट और मास्टर प्लान का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं और पर्यावरणविदों का आरोप है कि नीलेश चौधरी के इस 200 करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए इंदौर के मास्टर प्लान (Master Plan) में तय ‘ग्रीन बेल्ट’ (हरित क्षेत्र) की जमीन का लैंड-यूज़ (डायवर्जन) नियमों को ताक पर रखकर बदलवाया गया। आरोप है कि यह जमीन पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र में आती है।
- 2. सरकारी और सीलिंग की जमीन का खेल: शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि इस प्रोजेक्ट के दायरे में आने वाले कुछ खसरा नंबरों की जमीन या तो सरकारी सीलिंग एक्ट के तहत आती है या फिर भू-माफियाओं से जुड़े पुराने विवादित सौदों का हिस्सा रही है। रसूख के बल पर इस जमीन की रजिस्ट्री और टीएनसीपी (Town and Country Planning) क्लीयरेंस दिलाई गई।
- 3. नियमों को ताक पर रख मिली अनुमतियां: विपक्ष का सीधा आरोप है कि नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण विभाग से मिलने वाली एनओसी (NOC) को महज कुछ ही दिनों के भीतर ‘फास्ट-ट्रैक’ मोड में जारी कर दिया गया, जबकि आम नागरिकों को एक छोटी सी अनुमति के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं।
कांग्रेस का तीखा हमला: “यह भ्रष्टाचार का साक्षात उदाहरण है”
इस मामले के सामने आते ही कांग्रेस के स्थानीय नेताओं और विधायकों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा सरकार पर तीखे तीर छोड़े हैं।
कांग्रेस प्रवक्ताओं ने हुंकार भरते हुए कहा: “एक तरफ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव वीआईपी कल्चर और अवैध कब्जों पर कार्रवाई की बात करते हैं, दूसरी तरफ उनके अपने दल के बड़े नेता 200 करोड़ के अवैध प्रोजेक्ट खड़े कर रहे हैं। नियमों को ताक पर रखकर दी गई सभी अनुमतियों को तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए और इस मामले की निष्पक्ष जांच हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज से कराई जानी चाहिए।”
भाजपा नेता नीलेश चौधरी का पलटवार: “सारे आरोप राजनीति से प्रेरित”
चौतरफा हमलों के बीच भाजपा नेता और प्रोजेक्ट के मुख्य कर्ता-धर्ता नीलेश चौधरी ने भी मीडिया के सामने आकर अपना पक्ष मजबूती से रखा है। उन्होंने सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार और उनकी राजनैतिक व व्यावसायिक छवि को धूमिल करने की एक सोची-समझी साजिश बताया है।
नीलेश चौधरी की सफाई: “इस 200 करोड़ के प्रोजेक्ट से जुड़ी एक-एक इंच जमीन पूरी तरह वैध है। हमारे पास टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TNCP), रेरा (RERA), नगर निगम और पर्यावरण विभाग के सभी पुख्ता और वैध दस्तावेज मौजूद हैं। विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे मेरे व्यापारिक प्रोजेक्ट्स को निशाना बनाकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेक रहे हैं। हम किसी भी जांच के लिए पूरी तरह तैयार हैं और अदालत में मानहानि का दावा भी करेंगे।”
प्रशासनिक स्तर पर जांच शुरू, रुक सकता है काम
विवाद के तूल पकड़ने के बाद इंदौर कलेक्टर और संभागायुक्त ने संज्ञान लेते हुए राजस्व और नगर निगम के अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय संयुक्त समिति गठित कर दी है। इस समिति को अगले 7 दिनों के भीतर प्रोजेक्ट की जमीन की नपाई, सीमांकन और फाइलों के परीक्षण की रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। रियल एस्टेट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि जांच में नियमों का थोड़ा भी उल्लंघन पाया गया, तो ‘रेरा’ इस प्रोजेक्ट के रेसीडेंशियल अलॉटमेंट और कंस्ट्रक्शन पर रोक (Stay) लगा सकता है, जिससे निवेशकों के करोड़ों रुपये भी दांव पर लग सकते हैं।












