राजधानी भोपाल के रिहायशी इलाकों में अवैध रूप से संचालित व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ भोपाल नगर निगम (BMC) द्वारा की जा रही कार्रवाई बड़े विरोधाभासों और सवालों के घेरे में आ गई है। 5 अगस्त की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद निगम के आला अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि शहर के आवासीय क्षेत्रों में करीब 62,000 व्यावसायिक संपत्तियां चिह्नित की गई हैं। हालांकि, आगामी 15 सितंबर को शीर्ष अदालत में पेश होने वाले एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) हलफनामे में निगम ने केवल 7,951 संपत्तियों को ही नियम-11 (Rule-11) के तहत नोटिस जारी करने की बात कही है।
इस भारी विसंगति ने नगर निगम की सर्वे प्रक्रिया, कार्रवाई की गंभीरता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हलफनामे और जोनवार आंकड़ों में भी 334 मामलों का अंतर
निगम के आंतरिक रिकॉर्ड में आंकड़ों का तालमेल पूरी तरह गड़बड़ाया हुआ नजर आ रहा है:
- दावा बनाम हलफनामा: 62,000 से अधिक व्यावसायिक संपत्तियों के प्रारंभिक मौखिक और प्रशासनिक दावों के मुकाबले अदालत में प्रस्तुत दस्तावेज में यह संख्या घटकर महज 7,951 रह गई है।
- जोनवार आंकड़ों में विसंगति: नगर निगम के सभी 21 जोनों से जुटाए गए आंकड़ों का कुल योग 7,617 बैठता है, जबकि शपथ-पत्र (Affidavit) में 7,951 मामलों का उल्लेख किया गया है, यानी इसमें भी 334 मामलों का सीधा अंतर बना हुआ है।
- सील की गई संपत्तियों की नगण्य संख्या: हजारों अवैध गतिविधियों के बीच निगम की रिपोर्ट में अब तक केवल 190 व्यावसायिक परिसरों को बंद या सील किए जाने की पुष्टि की गई है। इसके अलावा 296 अवैध निर्माण के मामले चिह्नित किए गए हैं।
15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में दोपहर 2 बजे अहम सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के सत्य निकेतन हादसे के संदर्भ में आवासीय क्षेत्रों में अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर पूर्व में दिए गए अपने आदेशों के अनुपालन की समीक्षा के लिए सभी संबंधित प्राधिकरणों से हलफनामा मांगा है।
- शीर्ष अदालत ने जर्जर भवनों और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर की गई वास्तविक कार्रवाई का ब्योरा तलब किया है।
- भोपाल के मामले में 15 सितंबर को दोपहर 2 बजे जस्टिस की पीठ के समक्ष सुनवाई तय है, जहां निगम को इन आंकड़ों की भारी विसंगति पर कड़े सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
सालों पुराने नोटिस लंबित, जमीनी स्तर पर धीमी रफ्तार
स्थानीय नागरिकों और याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नगर निगम का अमला वर्षों पुराने जारी नोटिसों पर भी ठोस कार्रवाई करने से बचता रहा है। कई प्रमुख रिहायशी कॉलोनियों (अरेरा कॉलोनी, चूना भट्टी, एमपी नगर से सटे आवासीय सेक्टर और कोलार) में मास्टर प्लान के नियमों को ताक पर रखकर बड़े-बड़े शोरूम, अस्पताल, कोचिंग सेंटर और रेस्तरां संचालित हो रहे हैं, लेकिन निगम का अमला केवल नोटिस जारी करने तक ही सीमित नजर आता है।
सुप्रीम कोर्ट में 15 सितंबर की सुनवाई, बीएमसी की वास्तविक कार्रवाई और मध्य प्रदेश की हर प्रामाणिक (Authentic) रिपोर्टिंग के लिए जुड़े रहें हमारी वेबसाइट के साथ।












