इंदौर को स्वच्छता के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और ‘ग्रीन सिटी’ बनाने के संकल्प के तहत आज एक और सराहनीय पहल की गई है। शहर की प्रमुख सामाजिक संस्था भारत विकास परिषद द्वारा श्री गोविंदराम सेकसरिया प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (SGSITS कॉलेज, इंदौर) परिसर में स्थित पारंपरिक मियावाकी जंगल (Miyawaki Forest) को पुनर्जीवित और सघन बनाने के उद्देश्य से एक विशाल वृक्षारोपण अभियान (Plantation Drive) का आयोजन किया गया।
इस अभियान के तहत कॉलेज प्रबंधन, संस्था के सदस्यों और युवा छात्र-छात्राओं ने मिलकर परिसर के चिन्हित भूभाग पर सैकड़ों औषधीय, छायादार और फलदार पौधों का रोपण किया।
क्या है मियावाकी तकनीक और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
मियावाकी जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित की गई एक ऐसी अनूठी तकनीक है, जिसके जरिए बेहद कम जगह में बहुत तेजी से घने और प्राकृतिक जंगल उगाए जाते हैं।
- कम समय में घना जंगल: इस तकनीक से रोपे गए पौधे सामान्य पौधों की तुलना में 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं और 30 गुना तक अधिक घने होते हैं।
- पुनर्जीवित करने का प्रयास: एसजीएसआईटीएस परिसर में पहले से स्थापित इस मियावाकी पैच को देखरेख के अभाव और मौसम के उतार-चढ़ाव के कारण कुछ नुकसान पहुंचा था। भारत विकास परिषद ने इस पैच को पूरी तरह रिस्टोर (पुनर्जीवित) करने और खाली हो चुकी जगहों को नए पौधों से भरने का बीड़ा उठाया है।
स्थानीय प्रजातियों के पौधों को दी गई प्राथमिकता
पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) को बनाए रखने के लिए इस अभियान के दौरान केवल भारत की जलवायु के अनुकूल और स्थानीय प्रजातियों के पौधों का ही चयन किया गया। रोपे गए पौधों में मुख्य रूप से नीम, पीपल, बरगद, करंज, बेलपत्र, जामुन, आंवला और बंबू (बांस) शामिल हैं। यह पौधे न केवल पर्यावरण में ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाएंगे, बल्कि परिसर में आने वाले प्रवासी पक्षियों और छोटे जीवों के लिए एक बेहतरीन प्राकृतिक आवास भी तैयार करेंगे।
केवल रोपण नहीं, संरक्षण का भी लिया संकल्प
भारत विकास परिषद के पदाधिकारियों और एसजीएसआईटीएस के डायरेक्टर ने संयुक्त रूप से बताया कि यह अभियान केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं रहेगा।
संस्था के मुख्य समन्वयक ने कहा: “अक्सर लोग पौधे लगाकर भूल जाते हैं, लेकिन हम इस मियावाकी फॉरेस्ट की अगले तीन वर्षों तक लगातार मॉनिटरिंग करेंगे। पौधों की सिंचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन (टपकन सिंचाई पद्धति) और जैविक खाद (Organic Compost) का नियमित उपयोग किया जाएगा ताकि लगाए गए शत-प्रतिशत पौधे जीवित रहकर एक घने जंगल का रूप ले सकें।”
इस अवसर पर कॉलेज के प्राध्यापकों और छात्रों ने भी पर्यावरण को बचाने के लिए सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग पूरी तरह बंद करने और हर वर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी जिम्मेदारी उठाने की शपथ ली।












