प्रयागराज के माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच चला 10 दिनों का गतिरोध कल, 28 जनवरी 2026 को उनके मेले से प्रस्थान के साथ समाप्त हो गया। बिना ‘संगम स्नान’ किए शंकराचार्य के इस तरह जाने पर उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे “सनातन परंपरा का अपमान” बताते हुए भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है।
विवाद की शुरुआत 18 जनवरी (मौनी अमावस्या) को हुई थी, जब प्रशासन ने सुरक्षा और ‘नो-व्हीकल ज़ोन’ का हवाला देते हुए शंकराचार्य की पालकी को संगम जाने से रोक दिया था।
| तारीख | घटना (Event) |
| 18 जनवरी | प्रशासन ने पालकी रोकी; धक्का-मुक्की के आरोप; शंकराचार्य ने संगम जाने से मना किया और अनशन पर बैठे। |
| 20-25 जनवरी | प्रशासन ने शंकराचार्य से उनके ‘पद’ का प्रमाण पत्र (Certificate) मांगा; विवाद और गहराया। |
| 27 जनवरी | प्रशासन का समझौता प्रस्ताव (पालकी को ससम्मान ले जाने का ऑफर), जिसे शंकराचार्य ने ठुकरा दिया। |
| 28 जनवरी | “मेरा मन व्यथित है” कहकर शंकराचार्य बिना स्नान किए काशी (वाराणसी) के लिए रवाना हो गए। |
शंकराचार्य के प्रयागराज छोड़ने के तुरंत बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया (X) पर एक लंबा पोस्ट लिखकर भाजपा को घेरा।
अखिलेश यादव के आरोपों के मुख्य बिंदु:
- अहंकार का आरोप: अखिलेश ने कहा, “भाजपा के अहंकार ने सदियों पुरानी सनातनी परंपरा को तोड़ दिया। पूज्य शंकराचार्य जी का बिना स्नान किए जाना एक ‘अशुभ संकेत’ है।”
- बीजेपी सनातनी नहीं: उन्होंने भाजपा पर छद्म हिंदुत्व का आरोप लगाते हुए कहा कि जो सरकार संतों का सम्मान नहीं कर सकती, वह सनातनी होने का दावा कैसे कर सकती है? उन्होंने कहा, “अगर भाजपा चाहती तो पालकी को अपने कंधों पर उठाकर संगम तक ले जा सकती थी।”
- गंभीर चेतावनी: अखिलेश ने धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए लिखा— “आहत संत अर्थात सत्ता का अंत।” उन्होंने कहा कि संतों का अपमान कभी भी शुभ नहीं होता और इसका परिणाम भाजपा को भुगतना पड़ेगा।
भाजपा और प्रशासन का पक्ष: मंच पर दूसरी ओर, भाजपा और मेला प्रशासन का कहना है कि उन्होंने शंकराचार्य को मनाने की पूरी कोशिश की। प्रशासन ने दलील दी कि मौनी अमावस्या पर भारी भीड़ के कारण सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य था। प्रशासन ने इसे “शंकराचार्य का अपना निर्णय” बताया है।
निष्कर्ष: यह मुद्दा अब केवल धार्मिक नहीं रह गया है। यूपी चुनाव 2027 की आहट के बीच ‘हिंदू वोटों’ के ध्रुवीकरण की कोशिश में विपक्ष इस मुद्दे को “भाजपा बनाम असली सनातन” की लड़ाई बनाने में जुट गया है।















