मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की किल्लत को लेकर एक बार फिर राजनैतिक घमासान छिड़ गया है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक, आम जनता और विपक्ष ने सूबे की स्वास्थ्य प्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। मामला एक सरकारी अस्पताल में मरीज को सोनोग्राफी (Sonography) जांच के लिए 6 महीने बाद की तारीख (अपॉइंटमेंट) दिए जाने से जुड़ा है। इस बदहाली को लेकर लोगों ने सरकार के ‘विकसित भारत’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के नारों पर तंज कसना शुरू कर दिया है।
6 महीने बाद की तारीख; मरीज का फूटा गुस्सा अस्पतालों से आ रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, गंभीर बीमारियों और प्रसव से जुड़ी जांचों के लिए भी मरीजों को महीनों लंबी वेटिंग लिस्ट का सामना करना पड़ रहा है। एक पीड़ित मरीज के परिजनों ने पर्ची सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा, “सोनोग्राफी आज करवानी है और तारीख 6 महीने बाद की मिली है। क्या तब तक मरीज अपनी जान दांव पर लगाकर इंतजार करता रहे? यह है विकसित भारत की एक और असली तस्वीर।” इस घटना ने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की बड़ी खाई को उजागर कर दिया है।
मशीनें हैं पर ऑपरेटर गायब; व्यवस्था राम भरोसे राजनैतिक विश्लेषकों और विपक्ष का आरोप है कि प्रदेश के कई जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में लाखों रुपये की सोनोग्राफी मशीनें धूल खा रही हैं, क्योंकि वहां या तो रेडियोलॉजिस्ट नहीं हैं या फिर कोई परमानेंट ऑपरेटर तैनात नहीं है। विपक्ष ने मोहन यादव सरकार को घेरते हुए कहा कि बड़े-बड़े विज्ञापनों और दावों के बीच जमीनी स्तर पर गरीब जनता इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। जनता को खोखले वादे नहीं, अस्पतालों में डॉक्टर, स्टाफ और समय पर जांच की सुविधाएं चाहिए।

















