आगामी गणेशोत्सव (Ganesh Chaturthi) की तैयारियों के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) में प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की मूर्तियों के निर्माण और विसर्जन को लेकर चल रही जनहित याचिकाओं (PIL) की सुनवाई के दौरान एक बड़ा मोड़ आया है। महाराष्ट्र सरकार ने उच्च न्यायालय में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस साल गणेशोत्सव के लिए केवल ईको-फ्रेंडली (शाडू माटी/Clay) मूर्तियों के उपयोग की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील को तुरंत पूर्ण रूप से लागू करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
राज्य सरकार के इस बयान के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया।
⚖️ कोर्ट रूम में क्या तर्क दिए गए? (Court Arguments):
- राज्य सरकार/अधिवक्ता जनरल की दलील: महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमाल खाता की पीठ को बताया कि त्योहार में कुछ ही दिन बचे हैं और मूर्तिकार पहले ही लाखों की संख्या में PoP मूर्तियां बना चुके हैं। ऐसे में इस साल पूर्ण प्रतिबंध लगाने से मूर्तिकारों और श्रद्धालुओं को भारी नुकसान होगा।
- तीन साल में चरणबद्ध तरीके से बैन (Phased Out): सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि वह पीएम मोदी की ‘मन की बात’ में की गई अपील और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के दिशानिर्देशों का सम्मान करती है। सरकार अगले 3 वर्षों के भीतर (Phased Manner) PoP मूर्तियों के निर्माण और विसर्जन को पूरी तरह से समाप्त कर देगी।
- 2025 की नीति जारी रखने की मांग: राज्य सरकार ने अनुरोध किया कि पिछले साल (2025) की तर्ज पर इस साल भी 6 फीट से ऊंची मूर्तियों को समुद्र/कृत्रिम कुंडों में विसर्जित करने की छूट दी जाए और 24 घंटे के भीतर विसर्जन स्थल से अवशेष साफ करने की गारंटी ली जाए।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “क्या आपने पीएमओ को इस फैसले की जानकारी दी?”
सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार ने पीएम मोदी की अपील को इस साल लागू करने में असमर्थता जताई, तो बॉम्बे हाई कोर्ट की पीठ ने तल्ख रुख अपनाते हुए पूछा:
“प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक मंच से केवल ईको-फ्रेंडली माटी की मूर्तियों का उपयोग करने का आह्वान किया था। क्या आपने अपने इस रुख के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को सूचित किया है कि आप इसे लागू नहीं कर सकते?”
कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार सालों से नोटिस में होने के बावजूद बार-बार समय मांगती रही है, जिससे पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक जल निकायों को होने वाले नुकसान की अनदेखी हो रही है।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) की 2020 की गाइडलाइन्स के तहत नदियों, झीलों और समुद्र में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों के विसर्जन पर पूरी तरह रोक लगाने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, मूर्तिकार संघों की दलील है कि शाडू मिट्टी की पर्याप्त उपलब्धता न होने और अचानक बैन लगने से उनका रोजगार छिन जाएगा।
हाई कोर्ट इस मामले में सभी पक्षों को सुनने के बाद इस वर्ष की विसर्जन नीति पर अंतिम आदेश जारी करेगा।












