भोला पासवान शास्त्री बिहार की राजनीति के वह दुर्लभ रत्न थे, जो मुख्यमंत्री रहने के बाद भी अपनी झोपड़ी में रहते थे और उनके पास बैंक बैलेंस के नाम पर कुछ नहीं था। उन्हें ‘राजनीति का संत’ कहा जाता था, लेकिन 1960 और 70 के दशक की अस्थिर राजनीति ने उन्हें बार-बार कुर्सी से उतारा।\
| कार्यकाल | कब से कब तक | दिन | मुख्य कारण |
| पहली बार | मार्च 1968 – जून 1968 | 100 दिन | समर्थन वापसी और गठबंधन में दरार |
| दूसरी बार | जून 1969 – जुलाई 1969 | 13 दिन | कांग्रेस के भीतर गुटबाजी |
| तीसरी बार | जून 1971 – जनवरी 1972 | 7 महीने | अस्थिर गठबंधन और अंदरूनी दबाव |
भोला पासवान शास्त्री का मुख्यमंत्री बनना जितना ऐतिहासिक था, उनका हटाया जाना उतना ही दुखद। 1968 में जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने, तो वे बिहार के पहले दलित नेता थे जिन्होंने सत्ता की कमान संभाली। लेकिन वह दौर ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति का था।
सियासी मोहरा बने शास्त्री: कांग्रेस उस समय बिहार में कमजोर हो रही थी और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ था। कांग्रेस ने भोला पासवान को मुख्यमंत्री तो बनाया, लेकिन उन्हें कभी स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया। पार्टी के भीतर के ‘सिंडिकेट’ और बड़े सवर्ण नेताओं को एक दलित का नेतृत्व रास नहीं आ रहा था।
- ईमानदारी बनी दुश्मन: शास्त्री जी इतने ईमानदार थे कि उन्होंने अपने ही मंत्रियों के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए थे। उनकी यह शुचिता गठबंधन के साथियों और कांग्रेस के भ्रष्ट नेताओं को चुभने लगी, जिसके बाद साजिशें रचकर समर्थन वापस ले लिया गया।
- कुर्सी की बलि: दूसरी बार जब वे मुख्यमंत्री बने, तो कांग्रेस के आंतरिक झगड़ों के कारण उनकी सरकार महज 13 दिनों में गिर गई। उन्हें एक ‘स्टॉप-गैप’ (अस्थायी व्यवस्था) की तरह इस्तेमाल किया गया।
- झोपड़ी में बिताए अंतिम दिन: राजनीति की इस गंदी चाल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने तीन बार राज्य की कमान संभाली, निधन के समय उनके पास दाह संस्कार तक के पैसे नहीं थे।
विरासत: भोला पासवान शास्त्री की कहानी आज के नेताओं के लिए एक आईना है। उनकी कहानी यह भी बताती है कि कैसे स्वार्थ की राजनीति ने एक ईमानदार दलित चेहरे को बार-बार अपमानित किया। वे कुर्सी पर तो रहे, लेकिन सत्ता की चाबी हमेशा उन ताकतों के पास रही जिन्होंने ‘काली सियासत’ के जरिए लोकतंत्र को अपने हिसाब से चलाया।
















