मध्य प्रदेश के पूर्व अपर मुख्य सचिव और प्रखर विचारक रिटायर्ड आईएएस मनोज श्रीवास्तव ने अपने हालिया सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए ‘एपस्टीन कांड’ (Epstein Scandal) को केंद्र में रखकर पश्चिमी संस्कृति और उसके नैतिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अपनी बौद्धिक और दार्शनिक लेखन शैली के लिए जाने जाने वाले श्रीवास्तव ने इस प्रकरण को केवल एक आपराधिक मामला न मानकर इसे सभ्यतागत पतन का संकेत बताया है।
यहाँ उनके पोस्ट के मुख्य अंश और उठाए गए सवालों का विश्लेषण दिया गया है:
मनोज श्रीवास्तव के पोस्ट के प्रमुख बिंदु
मनोज श्रीवास्तव ने अपने पोस्ट में जेफ्री एपस्टीन मामले की परतों को खोलते हुए आधुनिक सभ्यता के उस ‘अंधेरे कोने’ पर प्रहार किया है, जिसे अक्सर प्रगतिशीलता के नाम पर ढंक दिया जाता है।
| विषय | उठाए गए सवाल/तर्क |
| सत्ता और अनैतिकता | कैसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोग (राजनेता, वैज्ञानिक, अरबपति) एक घिनौने अपराध तंत्र का हिस्सा बने? |
| पश्चिमी लिबरलिज्म | क्या पश्चिमी स्वतंत्रता और व्यक्तिवाद की परिणति अंततः बेलगाम कामुकता और शोषण में होती है? |
| नैतिक दोहरी नीति | जो पश्चिम दुनिया को ‘मानवाधिकार’ और ‘नैतिकता’ का पाठ पढ़ाता है, उसके शीर्ष स्तंभ स्वयं इस कदर खोखले कैसे हैं? |
| संस्कृति बनाम उपभोग | पश्चिमी संस्कृति में ‘उपभोग’ (Consumption) को ही जीवन का अंतिम सत्य मान लेने के दुष्परिणाम। |
मनोज श्रीवास्तव ने अपने पोस्ट में तर्क दिया है कि एपस्टीन कांड केवल एक व्यक्ति की विकृति नहीं है, बल्कि यह उस पश्चिमी आधुनिकता का लक्षण है जो धर्म, मर्यादा और आध्यात्मिक अंकुशों को पूरी तरह त्याग चुकी है।
पोस्ट का मुख्य सार:
- एलिट क्लास का चरित्र: उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी समाज का ‘अभिजात वर्ग’ (Elite Class) इतना भ्रष्ट हो जाए कि वह मासूमों के शोषण को अपना मनोरंजन बना ले, तो वह सभ्यता विनाश की ओर बढ़ रही होती है। उन्होंने इसे पश्चिमी जगत के “नैतिक दिवालियापन” का प्रमाण बताया।
- संस्कृति का वस्तुकरण: श्रीवास्तव के अनुसार, पश्चिमी विचारधारा ने हर चीज को ‘वस्तु’ (Object) बना दिया है। जब मनुष्य को भी केवल उपभोग की वस्तु मान लिया जाता है, तब एपस्टीन जैसे द्वीप (Islands) तैयार होते हैं जहाँ मानवता का गला घोंटा जाता है।
- भारतीय परिप्रेक्ष्य से तुलना: उन्होंने संकेतों में यह भी समझाने की कोशिश की है कि भारतीय संस्कृति में ‘संयम’ और ‘मर्यादा’ के जो मूल्य हैं, वे ही किसी समाज को ऐसी विकृतियों से बचा सकते हैं। पश्चिमी अंधानुकरण हमारे लिए भी घातक हो सकता है।
- न्याय और रसूख: उन्होंने इस बात पर भी क्षोभ व्यक्त किया कि कैसे वर्षों तक इस मामले को रसूखदार लोगों ने दबाए रखा, जो पश्चिमी न्यायिक निष्पक्षता के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
















