मध्य प्रदेश में ‘गरीब कल्याण’ की योजनाओं में सेंधमारी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 1,500 से अधिक ऐसे व्यक्ति चिन्हित किए गए हैं जो कागजों पर तो प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों के डायरेक्टर हैं, लेकिन असल जिंदगी में वे ‘पात्रता पर्ची’ बनवाकर मुफ्त राशन (गेहूं, चावल, नमक) का लाभ उठा रहे थे।
कैसे खुला यह ‘गजब’ खेल?
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग ने जब आधार कार्ड (Aadhaar) को पैन कार्ड (PAN) और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के डेटाबेस से लिंक किया, तो चौंकाने वाले मिलान सामने आए। जांच में पता चला कि ये लोग लग्जरी गाड़ियों में चलते हैं और कंपनियों का टर्नओवर करोड़ों में है, फिर भी इनके नाम ‘बीपीएल’ (BPL) या ‘अंत्योदय’ श्रेणी के राशन कार्डों में दर्ज थे।
यह खुलासा न केवल व्यक्तिगत लालच को दर्शाता है, बल्कि उस सिस्टम की खामियों को भी उजागर करता है जहाँ सत्यापन (Verification) की प्रक्रिया में इतनी बड़ी चूक हुई।
जांच के मुख्य बिंदु:
- आय का छुपाना: इन डायरेक्टर्स ने राशन कार्ड बनवाते समय अपनी वार्षिक आय को गरीबी रेखा से नीचे दिखाया था।
- क्षेत्रवार आंकड़े: सबसे ज्यादा मामले इंदौर, भोपाल और ग्वालियर जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों से सामने आए हैं।
- सरकारी कार्रवाई: विभाग ने अब इन सभी 1500 लोगों के राशन कार्ड तत्काल प्रभाव से निरस्त (Cancel) कर दिए हैं। प्रशासन अब इन लोगों से अब तक लिए गए राशन की बाजार दर पर वसूली (Recovery) करने की तैयारी कर रहा है।
सामाजिक प्रभाव: मुफ्त राशन योजना का उद्देश्य उन लोगों की मदद करना है जिनके पास दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं है। जब संपन्न लोग इस तरह योजनाओं का अनुचित लाभ उठाते हैं, तो वे सीधे तौर पर किसी जरूरतमंद का हक मार रहे होते हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि उन सरकारी कर्मचारियों की भी पहचान की जाए जिन्होंने इन फर्जी राशन कार्डों को सत्यापित किया था।
यह घटना याद दिलाती है कि डिजिटल इंडिया और डेटा इंटीग्रेशन के युग में अब भ्रष्टाचार करना आसान नहीं रह गया है। एक छोटे से ‘डेटा क्रॉस-चेक’ ने इन ‘अमीर गरीबों’ का मुखौटा उतार दिया है।
















