मध्य प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाने के लिए सरकार हर दिन करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन आंकड़ों की हकीकत डरावनी है। लोक निर्माण विभाग (PWD) और नेशनल हाईवे अथॉरिटी (NHAI) के बजट के अनुसार, प्रदेश में सड़कों के निर्माण और रखरखाव पर औसतन 21 करोड़ रुपये प्रतिदिन खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद, एमपी के हाईवे अब ‘मौत की सड़क’ बनते जा रहे हैं।
| विवरण | आंकड़े (औसत) |
| दैनिक खर्च | लगभग ₹21 करोड़ (निर्माण और मरम्मत) |
| सड़क दुर्घटनाएं | प्रतिवर्ष 50,000 से अधिक मामले |
| जान गंवाने वाले लोग | औसतन 35-40 लोग प्रतिदिन |
| मुख्य ‘डेथ ट्रैप’ | आगरा-मुंबई हाईवे (AB Road), इंदौर-इच्छापुर हाईवे, जबलपुर-जयपुर हाईवे |
हाईवे क्यों बन रहे हैं ‘किलर ट्रैक’? (250-300 शब्द)
भारी निवेश के बाद भी दुर्घटनाओं का ग्राफ कम नहीं हो रहा है। विशेषज्ञों ने इसके पीछे 5 प्रमुख कारण बताए हैं:
- इंजीनियरिंग में खामियां (Black Spots): सड़कों के डिजाइन में ‘ब्लाइंड टर्न’ (अंधे मोड़) और गलत तरीके से बनाए गए कट बड़ी वजह हैं। प्रदेश में 600 से अधिक ऐसे ‘ब्लैक स्पॉट्स’ चिन्हित किए गए हैं, जहाँ बार-बार हादसे होते हैं, लेकिन उनका स्थायी समाधान नहीं हो रहा।
- अधूरे निर्माण और डायवर्जन: कई हाईवे पर काम सालों से चल रहा है। निर्माण के दौरान लगाए गए डायवर्जन पर पर्याप्त संकेतक (Signage) और रोशनी नहीं होती, जिससे रात के समय वाहन अनियंत्रित होकर पलट जाते हैं।
- आवारा पशुओं का जमावड़ा: करोड़ों की लागत से बने चमचमाते हाईवे पर आवारा मवेशी मौत का कारण बन रहे हैं। विशेषकर रात के समय, तेज रफ्तार वाहनों के सामने अचानक मवेशी आने से भीषण टक्कर होती है। [Image showing stray cattle sitting in the middle of a high-speed expressway at night]
- ओवरस्पीडिंग और मॉनिटरिंग का अभाव: सड़कें बेहतर होने से वाहनों की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन ‘इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम’ (ITMS) केवल कागजों या चुनिंदा शहरों तक सीमित है। हाईवे पर ओवरस्पीडिंग रोकने के लिए पुलिस पेट्रोलिंग की भारी कमी है।
- गुणवत्ता से समझौता: दैनिक खर्च का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण सामग्री की भेंट चढ़ जाता है, जिससे पहली बारिश में ही करोड़ों की सड़कें गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं।
निष्कर्ष: केवल बजट बढ़ाने से सड़कें सुरक्षित नहीं होंगी। जब तक सख्त ऑडिट, ‘ब्लैक स्पॉट्स’ का सुधार और आवारा पशुओं के लिए ठोस नीति नहीं बनेगी, तब तक जनता के खून-पसीने की कमाई ‘मौत के सफर’ पर ही खर्च होती रहेगी।


















