मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण लागू करने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली और इसके समर्थन में दायर याचिकाओं पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में अंतिम सुनवाई प्रक्रिया पूरी हो गई है। प्रशासनिक न्यायाधीश जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष युगलपीठ (Special Division Bench) ने लगातार 15 दिनों तक दोनों पक्षों की विस्तृत और तीखी दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित (Reserved) रख लिया है।
वर्षों से लंबित इस संवैधानिक और नीतिगत मामले के फैसले पर प्रदेश के लाखों अभ्यर्थियों, युवाओं और सरकारी नौकरियों की प्रक्रिया में फंसे उम्मीदवारों की निगाहें टिकी हुई हैं।
दोनों पक्षों की प्रमुख दलीलें और कानूनी बिंदु (Key Legal Arguments)
- आरक्षण की 50% सीमा (Ceiling Limit) का मुद्दा:
- विरोधी पक्ष का तर्क: विरोधी पक्ष के वरिष्ठ वकीलों (जैसे गोपाल शंकरनारायणन) का तर्क था कि संविधान पीठ के ‘इंदिरा साहनी’ फैसले के तहत कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। यदि ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% किया जाता है, तो प्रदेश में कुल आरक्षण बढ़कर 63% हो जाएगा, जो असंवैधानिक है।
- समर्थक पक्ष का तर्क: ओबीसी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं (रामेश्वर सिंह ठाकुर, शशांक रत्नू आदि) ने दलील दी कि प्रदेश में 10% EWS आरक्षण लागू होने के बाद 50% की सीमा पहले ही टूट चुकी है। इसके अतिरिक्त, मध्य प्रदेश में ओबीसी वर्ग की आबादी लगभग 51 प्रतिशत है, इसलिए 27% आरक्षण जनसंख्या और सामाजिक न्याय के अनुपात में पूरी तरह उचित है।
- भर्तियों और 87:13 फॉर्मूले पर प्रभाव:
- सुनवाई के दौरान पीठ ने राज्य सरकार से अब तक अटकी हुई भर्तियों और ’87:13 फॉर्मूले’ के तहत होल्ड पर रखे गए पदों व उम्मीदवारों के भविष्य पर भी सवाल किए।
- वकीलों ने कोर्ट के समक्ष ‘डी-फैक्टो सिद्धांत’ (De-facto principle) का हवाला देते हुए आग्रह किया कि मुकदमेबाज़ी के कारण किसी भी अभ्यर्थी का भविष्य अधर में न रहे।
फैसले का क्या होगा प्रभाव?
- लाखों अभ्यर्थियों को राहत का इंतजार: हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद MPPSC (मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग), कर्मचारी चयन मंडल (ESB) और अन्य भर्ती बोर्डों द्वारा रोकी गई या सशर्त जारी की गई दर्जनों भर्ती परीक्षाओं के अंतिम परिणाम और 13% होल्ड सूचियों का रास्ता साफ हो सकेगा।
- विस्तृत फैसला आने में लग सकता है समय: कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, चूंकि मामला काफी पेचीदा और कई संवैधानिक बिंदुओं से जुड़ा है, इसलिए पीठ द्वारा विस्तृत फैसला सुनाने में कुछ हफ्तों का समय लग सकता है।












