देश के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान भारतीय प्रबंध संस्थान इंदौर (IIM Indore) द्वारा किए गए एक नवीनतम अध्ययन में भारत के ग्रामीण और छोटे कस्बों में बढ़ रहे डिजिटल उद्यमिता (Digital Entrepreneurship) के एक अभूतपूर्व रुझान का खुलासा हुआ है। अध्ययन के अनुसार, भारत के ग्रामीण इलाकों के युवा और स्थानीय निवासी यूट्यूब (YouTube) और सोशल मीडिया के जरिए अपनी क्षेत्रीय भाषा, स्थानीय संस्कृति, खेती-किसानी और दैनिक जीवन के ताने-बाने से जुड़ा कंटेंट बनाकर न केवल आत्मनिर्भर बन रहे हैं, बल्कि करोड़ों रुपये के संपन्न डिजिटल बिजनेस (Digital Businesses) खड़े कर रहे हैं।
आईआईएम इंदौर के मीडिया और डिजिटल रणनीति विशेषज्ञों द्वारा की गई इस रिसर्च में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार के दर्जनों सफल ग्रामीण डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स के बिजनेस मॉडल का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
आईआईएम इंदौर की स्टडी के 5 प्रमुख निष्कर्ष:
1. ‘लोकल कंटेंट’ की प्रचंड मांग (Hyper-Local Strategy)
अध्ययन में पाया गया कि ग्रामीण दर्शक अब अपनी बोली, क्षेत्रीय पकवान, देशी जुगाड़, कृषि पद्धतियों और लोक कथाओं से जुड़े कंटेंट को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं। यह प्रामाणिकता (Authenticity) दर्शकों को सीधे जोड़ती है, जो पारंपरिक मेट्रो-आधारित मीडिया में गायब थी।
2. विज्ञापन से परे कमाई का दायरा (Monetization Beyond Adsense)
आईआईएम की रिपोर्ट बताती है कि ये ग्रामीण यूट्यूबर्स सिर्फ यूट्यूब ऐडसेंस (AdSense) पर निर्भर नहीं हैं। वे अपनी इस डिजिटल पहुंच का इस्तेमाल कई अन्य माध्यमों से कमाई के लिए कर रहे हैं:
- ब्रांड एंडोर्समेंट और लोकल स्पॉन्सरशिप: स्थानीय कृषि-कंपनियों, बीज-खाद ब्रांड्स और क्षेत्रीय एफएमसीजी (FMCG) प्रॉडक्ट्स का प्रचार।
- ई-कॉमर्स और डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (D2C): अपने वीडियो के माध्यम से शुद्ध देशी उत्पाद जैसे—आर्गेनिक अनाज, हस्तशिल्प, अचार, और हस्तनिर्मित वस्तुएं सीधे दर्शकों को बेचना।
- स्थानीय रोजगार का सृजन: सफल ग्रामीण क्रिएटर्स ने अपने गांवों में ही स्क्रिप्ट राइटर, वीडियो एडिटर, कैमरामैन और लॉजिस्टिक्स संभालने वालों की टीम बनाकर स्थानीय युवाओं को रोजगार दिया है।
3. भाषा की दीवारें टूटीं (Hyper-Regional Languages)
अध्ययन के मुताबिक, मालवी, बुंदेलखंडी, भोजपुरी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी जैसी क्षेत्रीय बोलियों में बना कंटेंट इंटरनेट पर बहुत तेजी से वायरल हो रहा है। इससे उन ब्रांड्स को भी फायदा मिल रहा है जो टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा ग्रामीण बाजारों तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं।
4. डिजिटल साक्षरता और सस्ते डेटा का असर
सस्ते 4G/5G स्मार्टफोन और उच्च गति वाले इंटरनेट ने ग्रामीण भारत में कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में प्रवेश की बाधाओं (Entry Barriers) को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। महज 10 से 15 हजार रुपये के स्मार्टफोन से शुरू हुआ सफर अब बड़े स्टूडियो और प्रोफेशनल कैमरों तक पहुंच रहा है।
आईआईएम इंदौर के शोधकर्ताओं की राय:
“ग्रामीण यूट्यूबर्स केवल मनोरंजन नहीं परोस रहे हैं, वे आधुनिक ‘सोशियो-इकोनॉमिक चेंज मेकर्स’ (Socio-Economic Change Makers) बनकर उभर रहे हैं। वे साबित कर रहे हैं कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में सफल होने के लिए अब आपको मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों में रहने की जरूरत नहीं है। आपकी स्थानीय जमीन और मौलिक सोच ही आपका सबसे बड़ा ब्रांड है।”












