गंभीर बीमारियों से जूझ रहे निर्धन और जरूरतमंद नागरिकों के त्वरित उपचार के लिए दी जाने वाली मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान (CM Discretionary Fund) की राशि में करोड़ों रुपये के बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। जालसाजों और बिचौलियों के एक संगठित गिरोह ने फर्जी दस्तावेज और फर्जी मरीजों के नाम पर अस्पतालों के नाम से सहायता राशि स्वीकृत कराई।
इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब विभाग द्वारा डिजिटल वेरिफिकेशन और ऑडिट के दौरान सैकड़ों आवेदनों में एक ही मोबाइल नंबर दर्ज पाया गया। पोल खुलते ही प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है और अब पूरे मामले की ईओडब्ल्यू (EOW) या क्राइम ब्रांच से विस्तृत जांच कराने की तैयारी की जा रही है।
एक ही मोबाइल नंबर से ऐसे खुली घोटाले की पोल (How the Scam Was Exposed)
- संदेहास्पद पैटर्न का खुलासा: मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के स्वेच्छानुदान प्रकोष्ठ द्वारा जब सहायता पाने वाले लाभार्थियों का रैंडम वेरिफिकेशन (सत्यापन) किया जा रहा था, तो डेटाबेस में कई फर्जी आवेदन पकड़े गए।
- सैकड़ों आवेदनों में एक ही नंबर: जांच के दौरान पता चला कि दर्जनों अलग-अलग जिलों से आए कई कथित ‘गंभीर मरीजों’ के आवेदनों में संपर्क हेतु एक ही या कुछ चुनिंदा मोबाइल नंबर ही लिखे हुए थे।
- फर्जी बिल और अस्पताल की मुहर: जब उन नंबरों पर संपर्क करने का प्रयास किया गया और संबंधित अस्पतालों में सत्यापन कराया गया, तो सामने आया कि कई नाम के मरीज अस्पताल में कभी भर्ती ही नहीं हुए थे। उनके मेडिकल बिल, डॉक्टर के पर्चे और डिस्चार्ज समरी पूरी तरह कूटरचित (Fake) थे।
कैसे दिया गया फर्जीवाड़े को अंजाम? (Modus Operandi)
- बिचौलियों और अस्पताल कर्मियों की मिलीभगत: गिरोह के सदस्यों ने जिला स्तर पर कलेक्ट्रेट और सिविल सर्जन कार्यालयों के आसपास जाल बिछा रखा था।
- सरकारी योजनाओं की आड़: आयुष्मान भारत या अन्य योजनाओं के इतर, फर्जी मरीज का आईडी प्रूफ और फर्जी इलाज का खर्च दिखाकर ₹50,000 से लेकर ₹2 लाख या उससे अधिक की सहायता राशि स्वीकृत कराई जाती थी।
- खातों में खेल: स्वीकृत राशि सीधे अस्पताल या संबंधित बैंक खातों में ट्रांसफर कराई जाती थी, जहाँ से साठगांठ कर कैश निकाल लिया जाता था।
शासन का कड़ा रुख: रिकवरी और एफआईआर के निर्देश
- विभागीय जांच शुरू: फर्जीवाड़े के सामने आते ही स्वेच्छानुदान शाखा ने पिछले 2 से 3 वर्षों में बांटी गई पूरी राशि के ऑडिट के निर्देश दे दिए हैं।
- एफ़आईआर और ईओडब्ल्यू जांच: फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले बिचौलियों, फर्जी मरीजों और संलिप्त कर्मचारियों/अस्पतालों को चिन्हित कर उनके खिलाफ धोखाधड़ी (IPC/BNS) का आपराधिक मामला दर्ज कराने की तैयारी है।
- प्रक्रिया होगी और सख्त: भविष्य में ऐसे फर्जीवाड़े को रोकने के लिए अब मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान के लिए आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन और ओटीपी (OTP) आधारित मोबाइल वेरिफिकेशन अनिवार्य करने की कार्ययोजना बनाई जा रही है।












