मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में चन्नी-मन्नी मध्यम सिंचाई परियोजना विकास के नाम पर किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत बनकर उभरी है। किसानों का आरोप है कि इस बांध के निर्माण से उनकी उपजाऊ जमीन तो जा रही है, लेकिन इसके बदले में जो मुआवजा और पुनर्वास मिलना चाहिए था, वह कागजी दांव-पेंचों में उलझा हुआ है।
सर्वे और मुआवजे पर सवाल
किसानों की सबसे बड़ी शिकायत डूब क्षेत्र के गलत सर्वे को लेकर है। किसानों का कहना है कि प्रशासन द्वारा किए गए सर्वे में भारी खामियां हैं। कई ऐसे खेत भी डूब क्षेत्र में दिखाए गए हैं जो ऊंचाई पर हैं, जबकि प्रभावित किसानों को मिलने वाली मुआवजा राशि बाजार दर से काफी कम है। किसान संघर्ष समिति और स्थानीय ग्रामीणों ने कई बार कलेक्ट्रेट का घेराव किया है, लेकिन समाधान के नाम पर केवल आश्वासन ही मिले हैं।
चन्नी-मन्नी बांध परियोजना का उद्देश्य हजारों हेक्टेयर भूमि को सिंचित करना था, लेकिन वर्तमान में यह परियोजना विस्थापन के डर का पर्याय बन गई है। प्रभावित गांवों के किसानों का कहना है कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी इन जमीनों पर खेती कर अपना गुजारा कर रहे हैं। अब न केवल उनकी आजीविका पर संकट है, बल्कि उनके घर और पुरखों की विरासत भी पानी में समाने वाली है।
किसानों के मुख्य मुद्दे निम्नलिखित हैं:
- अल्प मुआवजा: सरकार द्वारा दी जा रही राशि इतनी कम है कि उससे नई जमीन खरीदना असंभव है।
- पुनर्वास की कमी: जिन परिवारों के घर डूब में आ रहे हैं, उनके लिए नई बसाहट और बुनियादी सुविधाओं की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई है।
- सिंचाई का लाभ: स्थानीय किसानों को डर है कि बांध का पानी उनके खेतों को डुबोएगा, लेकिन इसका लाभ (सिंचाई) दूर के क्षेत्रों या उद्योगों को मिलेगा।
प्रशासन का तर्क है कि परियोजना से क्षेत्र का जलस्तर बढ़ेगा और भविष्य में कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी। हालांकि, जब तक प्रभावित किसानों का उचित पुनर्वास नहीं होता, तब तक यह “विकास” उनके लिए विनाश के समान है। क्षेत्र में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि क्या सरकार किसानों की जायज मांगों को मानकर उन्हें न्याय दिलाती है या फिर यह आंदोलन और उग्र रूप धारण करेगा।

















