राजेंद्र महतो गया जिले के अतरी प्रखंड के सिधौली गांव के निवासी थे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोहा लिया था, जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
| पहलू | विवरण |
| उम्र | 102 वर्ष |
| आंदोलन | 1942 भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) |
| जेल यात्रा | गया जेल में बिताए थे कई महीने। |
| विडंबना | 78 सालों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे, पर नहीं मिला ‘ताम्र पत्र’ या पेंशन। |
राजेंद्र महतो का जीवन सादगी और देशप्रेम का उदाहरण था। उनके निधन के बाद गांव में शोक की लहर है, लेकिन ग्रामीण इस बात से आक्रोशित हैं कि प्रशासन ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे।
अधूरे रह गए सपने:
- साक्ष्य की कमी या लापरवाही: परिजनों के अनुसार, राजेंद्र महतो के पास जेल जाने के पर्याप्त प्रमाण थे। उन्होंने पटना से लेकर दिल्ली तक कई बार आवेदन दिया, लेकिन लालफीताशाही (Red-tapism) के कारण उनकी फाइल कभी मंजूर नहीं हुई।
- अंतिम समय तक उम्मीद: 100 साल की उम्र पार करने के बाद भी वे अक्सर कहते थे कि “पैसे की लालच नहीं है, बस सरकार यह मान ले कि मैं भी बापू की फौज का एक सिपाही था।” 3. प्रशासनिक उदासीनता: आज जब देश गणतंत्र दिवस का जश्न मना रहा था, तब एक जीवित इतिहास मौन हो गया। उनके अंतिम संस्कार के समय स्थानीय जनप्रतिनिधियों की गैर-मौजूदगी ने प्रशासन के रवैये पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों का संकल्प: सिधौली गांव के लोगों ने मांग की है कि राजेंद्र महतो को मरणोपरांत स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया जाए और गांव में उनकी स्मृति में एक स्मारक बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी उनके बलिदान को जान सके।

















