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Inspiring Journey: घर छोड़ने से लेकर ‘पद्मश्री’ तक का सफर; जानें सुरों के सरताज कैलाश खेर की वो कहानी, जिसने उन्हें फर्श से अर्श पर पहुंचाया

Authentic News by Authentic News
July 7, 2026
in Lifestyle, News
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मंच पर हाथ में माइक थामे सूफी अंदाज में आंखें बंद कर गाते हुए और राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण करते गायक कैलाश खेर की कोलाज तस्वीर।

image source:google.com

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भारतीय संगीत जगत में जब भी रूहानी, सूफी और ठेठ गंवई आवाज का जिक्र होता है, तो एक नाम सबसे पहले जहन में आता है—कैलाश खेर (Kailash Kher)। अपनी कशिश भरी और बुलंद आवाज से ‘अल्लाह के बंदे’ और ‘तेरी दीवानी’ जैसे कालजयी गाने देने वाले कैलाश खेर का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। आज वे जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने जिंदगी के ऐसे थपेड़े खाए हैं कि कोई भी आम इंसान हार मान जाए। लेकिन संगीत के प्रति उनकी दीवानगी ने उन्हें अंततः देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ तक पहुंचा दिया।

आइए जानते हैं उनके संघर्ष से सफलता तक का यह पूरा सफरनामा:

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1. संगीत के लिए 14 साल की उम्र में छोड़ा घर, झेलीं आर्थिक तंगियां

उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे कैलाश खेर के पिता मेहर सिंह खेर एक साधारण लोक गायक थे, जो घरेलू आयोजनों में गाते थे। कैलाश को बचपन से ही संगीत का शौक था, लेकिन वे संगीत की पारंपरिक और शास्त्रीय शिक्षा लेना चाहते थे, जिसके लिए उनके परिवार के पास पैसे नहीं थे।

  • कड़ा फैसला: संगीत सीखने की इसी जिद में कैलाश खेर ने महज 14 वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ दिया।
  • गुजर-बसर के लिए संघर्ष: घर छोड़ने के बाद दिल्ली में पेट पालने और संगीत की फीस भरने के लिए उन्होंने बच्चों को ₹150-₹150 में ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने संगीत सीखने के लिए कई गुरुओं के चक्कर काटे, लेकिन कहीं भी बात नहीं बनी।

2. बिजनेस में हुए कंगाल, मन में आया आत्महत्या का विचार

संघर्ष के दिनों में जब संगीत से बात नहीं बनी, तो साल 1999 में उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर ‘हैंडीक्राफ्ट’ (हस्तशिल्प) का बिजनेस शुरू किया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; बिजनेस में उन्हें भारी घाटा हुआ और वे पूरी तरह कंगाल हो गए।

इस आर्थिक तंगी और डिप्रेशन के दौर में कैलाश खेर इतने टूट चुके थे कि उनके मन में आत्महत्या (Suicide) तक का विचार आ गया था। उन्होंने ऋषिकेश जाकर गंगा नदी में कूदकर जान देने की कोशिश भी की थी, लेकिन वहां मौजूद एक शख्स ने उन्हें बचा लिया। इसके बाद वे अध्यात्म और संगीत की ओर दोबारा मुड़े।

3. मायानगरी मुंबई आगमन और ₹5000 का पहला गाना

साल 2001 में कैलाश खेर जेब में महज कुछ रुपये लेकर मुंबई (मायानगरी) पहुंचे। वहां वे स्टूडियो-टू-स्टूडियो भटकते थे ताकि कोई संगीतकार उनकी आवाज सुन ले। उनकी किस्मत तब बदली जब उनकी मुलाकात संगीतकार राम संपत से हुई। राम संपत ने उन्हें एक जिंगल (विज्ञापन) गाने का मौका दिया, जिसके लिए उन्हें ₹5000 मिले। यह उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था।

4. ‘अल्लाह के बंदे’ ने रातों-रात बनाया स्टार

  • बॉलीवुड में एंट्री: साल 2003 में आई एक कम बजट की फिल्म ‘वैसा भी होता है पार्ट-2’ में कैलाश खेर को एक गाना गाने का मौका मिला, जिसके बोल थे—‘अल्लाह के बंदे हंसदे’।
  • बना इतिहास: यह गाना रिलीज होते ही देश के कोने-कोने में गूंज उठा। इस एक गाने ने कैलाश खेर की तकदीर बदल दी और वे रातों-रात स्टार बन गए। इसके बाद उन्होंने अपना बैंड ‘कैलाशा’ (Kailasa) बनाया और ‘तेरी दीवानी’, ‘सैयां’, ‘बम बम लहरी’ जैसे गानों से दुनिया भर में सूफी संगीत का डंका बजाया। उन्होंने बाहुबली फिल्म के लिए ‘कौन है वो’ जैसा ब्लॉकबस्टर गाना भी गाया।

5. साल 2017 में ‘पद्मश्री’ से हुए सम्मानित

कैलाश खेर के इसी असाधारण योगदान, लोक संगीत को पुनर्जीवित करने और भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने के लिए भारत सरकार ने साल 2017 में उन्हें ‘पद्मश्री’ (Padma Shri) से सम्मानित किया।

एक लड़का जो कभी ट्यूशन पढ़ाकर ₹150 कमाता था और जिसके पास रहने को छत नहीं थी, आज वह अपनी कड़ी मेहनत और अटूट विश्वास के दम पर करोड़ों दिलों पर राज कर रहा है। कैलाश खेर का सफर यह सिखाता है कि अगर आपके सपनों में जान है, तो परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, आपकी मंजिल आपसे दूर नहीं रह सकती।

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