सोशल मीडिया पर अक्सर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे मजाकिया और व्यंग्यात्मक राजनैतिक मीम्स वायरल होते रहते हैं। इन मीम्स को देखकर कई बार आम पाठकों के मन में यह कौतूहल पैदा होता है कि क्या वाकई भारत में किसी राजनैतिक दल को ‘कॉकरोच’ (Cockroach) का चुनाव चिन्ह मिल सकता है? भारत में चुनाव चिन्हों का आवंटन ‘चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के तहत केवल भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा किया जाता है। यदि मौजूदा नियमों की बात करें, तो कोई भी पार्टी चाहकर भी इस जीव को अपना प्रतीक चिन्ह नहीं बना सकती।
1991 से जीव-जंतुओं और कीट-पतंगों के प्रतीकों पर लगा पूर्ण प्रतिबंध आजादी के बाद शुरुआती दशकों में चुनाव आयोग पशु-पक्षियों के सिंबल आवंटित कर देता था, जैसे बसपा का ‘हाथी’। लेकिन साल 1989 के चुनाव के दौरान तमिलनाडु में एक पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा प्रचार के लिए असली मुर्गों का क्रूरता से इस्तेमाल किया गया, जिससे कई जीवों की मौत हो गई। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की भारी आपत्ति के बाद, चुनाव आयोग ने 1991 से नए दलों को किसी भी जानवर, पक्षी या जीवित प्राणी का नया चुनाव चिन्ह आवंटित करना पूरी तरह बंद कर दिया। चूंकि कॉकरोच (तिलचट्टा) भी कीट और जीव की श्रेणी में आता है, इसलिए यह बैन इस पर भी लागू होता है।
स्वच्छता का जोखिम और नकारात्मक छवि भी है बड़ी वजह चुनाव आयोग व्यावहारिक पहलुओं और जनहित को ध्यान में रखकर ही ‘फ्री सिंबल्स’ (Free Symbols) की सूची तैयार करता है। यदि कॉकरोच जैसा सिंबल अलॉट किया गया, तो अति-उत्साही कार्यकर्ता रैलियों में असली कॉकरोच डिब्बों में भरकर ला सकते हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता (Public Health & Hygiene) के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसके अलावा, कॉकरोच को गंदगी और बीमारी से जोड़कर देखा जाता है। आयोग केवल उन्हीं वस्तुओं को मंजूरी देता है जिनकी छवि सकारात्मक या तटस्थ हो। अतः नियमों के मुताबिक किसी भी दल को यह सिंबल मिलना नामुमकिन है।

















