मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों और विभिन्न सरकारी विभागों में टेंडर प्रक्रिया को लेकर एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। सरकारी खजाने की सुरक्षा को पूरी तरह दांव पर लगाते हुए कुछ रसूखदार अधिकारियों ने नियमों और वित्तीय संहिताओं को ताक पर रख दिया है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं और आउटसोर्सिंग कार्यों के लिए निजी और चहेती एजेंसियों को बिना ‘बैंक गारंटी’ (Bank Guarantee) लिए ही करोड़ों रुपये के बड़े काम आवंटित कर दिए गए हैं। सरकारी नियमों का यह खुला उल्लंघन न केवल वित्तीय सुरक्षा से बड़ा खिलवाड़ है, बल्कि इसमें बड़े भ्रष्टाचार की बू भी आ रही है।
परफॉर्मेंस गारंटी को किया दरकिनार, डूब सकता है जनता का पैसा विभागीय सूत्रों और आरटीआई (RTI) से मिले दस्तावेजों के अनुसार, सरकारी निर्माण और सेवा अनुबंधों के नियमों के तहत किसी भी निजी एजेंसी को काम सौंपने से पहले उसकी कार्यकुशलता और सुरक्षा के तौर पर 5 से 10 प्रतिशत की ‘परफॉर्मेंस बैंक गारंटी’ जमा कराना अनिवार्य होता है। यह गारंटी इसलिए ली जाती है ताकि यदि एजेंसी काम बीच में छोड़ दे या घटिया निर्माण करे, तो सरकारी नुकसान की भरपाई की जा सके। लेकिन इस मामले में बिना किसी ठोस वित्तीय सुरक्षा और बैकअप के ही एग्रीमेंट साइन कर दिए गए और एडवांस पेमेंट भी जारी कर दी गई, जो सीधे तौर पर राजकोषीय अनुशासन का उल्लंघन है।
जांच के घेरे में कई वरिष्ठ अधिकारी, विपक्ष ने खोला मोर्चा मामला उजागर होने के बाद राजनैतिक पारा भी चढ़ गया है। मुख्य विपक्षी दल ने इस प्रशासनिक सांठगांठ को ‘महा-घोटाला’ करार देते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) से उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए यह जानबूझकर किया गया कृत्य है। दूसरी ओर, शासन स्तर पर भी इस गंभीर लापरवाही का संज्ञान लिया गया है, और संबंधित विभागों से तत्काल टेंडर आवंटन की मूल फाइलें तलब की गई हैं। यदि समय रहते इन एग्रीमेंट्स को निरस्त कर बैंक गारंटी नहीं ली गई, तो डिफ़ॉल्ट होने की स्थिति में करोड़ों रुपये डूबने की पूरी आशंका है।

















