भारतीय राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। CJP (Criminals Justice Party) के संस्थापक अभिजीत दिप्के का एक बयान वायरल हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि ‘हम दलित परिवार से हैं, तो भाजपा के वोटर कैसे हो सकते हैं?’ यह बयान सोशल मीडिया पर तूफान मचा गया है और लोग इसके विरोध में आवाज उठा रहे हैं।
दिप्के का यह बयान दलितों को भाजपा के साथ जोड़ने के बारे में एक रूढ़िवादी सोच प्रदर्शित करता है। आलोचकों का कहना है कि यह बयान दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक सोच को नकारता है और उन्हें एक विशेष राजनीतिक पार्टी के साथ जोड़ता है।
जंतर मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान यह विवाद सामने आया। विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक विरोधियों ने दिप्के के बयान की तीव्र आलोचना की। उन्होंने कहा कि दलित भी किसी भी पार्टी को वोट देने के लिए स्वतंत्र हैं और किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह उनकी राजनीतिक पसंद पर सवाल उठाए।
इस विवाद ने भारतीय राजनीति में जातिगत राजनीति की समस्या को फिर से उजागर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान सामाजिक विभाजन को बढ़ाते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। यह बहस भारत में सामाजिक समानता और राजनीतिक स्वतंत्रता के बारे में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है।











