न्यायिक व्यवस्था की साख और पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। रिटायरमेंट से ठीक पहले जजों द्वारा दिए जा रहे ताबड़तोड़ और संदिग्ध फैसलों पर टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति” करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों को गंभीर बताते हुए संबंधित हाईकोर्ट को जांच और समीक्षा के लिए भेज दिया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि न्यायाधीशों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पूरे कार्यकाल में निष्पक्षता, संतुलन और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें। रिटायरमेंट से पहले जल्दबाजी में दिए गए आदेश न केवल संदेह पैदा करते हैं, बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “लास्ट ओवर में छक्के मारने जैसी मानसिकता” से दिए गए फैसले आम जनता के बीच गलत संदेश भेजते हैं। ऐसे आदेशों से यह धारणा बनती है कि कहीं न कहीं प्रक्रिया और मंशा पर सवाल उठाए जा सकते हैं, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह संदिग्ध आदेशों की गहराई से समीक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में इस तरह की प्रवृत्ति पर रोक लगे। साथ ही यह भी कहा गया कि न्यायिक अनुशासन बनाए रखना पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर आत्ममंथन का संकेत है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शीर्ष अदालत न केवल न्याय देने में, बल्कि न्यायिक आचरण की निगरानी में भी कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहती।
यह फैसला न्यायिक पारदर्शिता और विश्वास को मजबूत करने की दिशा में एक अहम संदेश माना जा रहा है।
















