देश की राजनीति उस समय गरमा गई जब एक विपक्षी नेता द्वारा यह दावा किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले दो सप्ताह में इस्तीफा दे सकते हैं। इस बयान के सामने आते ही सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई और सत्तापक्ष व विपक्ष आमने-सामने आ गए।
यह दावा विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक मंच से किया गया, जिसके बाद भाजपा ने इसे भ्रम फैलाने वाला और गैर-जिम्मेदाराना बयान बताया। भाजपा नेताओं का कहना है कि इस तरह के दावे बिना किसी ठोस आधार के किए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य केवल राजनीतिक माहौल को भ्रमित करना है।
वहीं विपक्ष का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां, अंदरूनी दबाव और हालिया घटनाक्रम इस तरह के कयासों को जन्म दे रहे हैं। हालांकि विपक्ष ने अपने दावे के समर्थन में कोई स्पष्ट सबूत पेश नहीं किया, लेकिन बयान के बाद राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह के बयान अक्सर रणनीतिक दबाव बनाने या मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए दिए जाते हैं। उनका मानना है कि प्रधानमंत्री के इस्तीफे जैसा बड़ा कदम केवल कयासों के आधार पर नहीं जोड़ा जा सकता।
सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर बहस छिड़ गई है। समर्थक इसे अफवाह बता रहे हैं, जबकि आलोचक सरकार से पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।
भाजपा ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन पूरी मजबूती से कर रहे हैं और इस तरह के दावे राजनीतिक हताशा का परिणाम हैं।
कुल मिलाकर, पीएम मोदी के इस्तीफे को लेकर किया गया यह दावा फिलहाल राजनीतिक बयानबाजी और अटकलों तक सीमित नजर आ रहा है, लेकिन इसने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि देश की राजनीति में एक बयान भी कितना बड़ा तूफान खड़ा कर सकता है।
















