मध्य प्रदेश में बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनके पुनर्वास के लिए जिम्मेदार मध्य प्रदेश राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (MPSCPCR) में वर्तमान में कुल 431 मामले लंबित (Pending) हैं। आयोग द्वारा जारी हालिया समीक्षा आंकड़ों के अनुसार, लंबित शिकायतों में सबसे अधिक संख्या किशोरी न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम यानी JJ Act (Juvenile Justice Act) से संबंधित मामलों की है।
लंबित मामलों का आंकड़ा सामने आने के बाद आयोग ने सभी संबंधित जिला बाल संरक्षण इकाइयों (DCPU), बाल कल्याण समितियों (CWC) और पुलिस प्रशासन को लंबित प्रकरणों में तेजी से जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
📊 लंबित मामलों का श्रेणीवार विवरण:
- JJ Act (किशोरी न्याय अधिनियम) के मामले सबसे ऊपर: कुल 431 लंबित मामलों में से सर्वाधिक प्रकरण बच्चों की देखरेख, आश्रय गृहों (Shelter Homes), गोद लेने की प्रक्रिया और विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों से संबंधित हैं।
- RTE (शिक्षा का अधिकार) और स्कूल फीस विवाद: निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश न देने, फर्जी दस्तावेज और निजी स्कूलों द्वारा प्रताड़ित करने की शिकायतें दूसरे स्थान पर हैं।
- POCSO और बाल श्रम से जुड़ी शिकायतें: यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO Act), बाल श्रम (Child Labour) और बाल विवाह रोकने से जुड़े दर्जनों मामलों में पुलिस व प्रशासनिक एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है।
लंबन (Pendency) के मुख्य कारण:
- विभागीय प्रतिक्रिया में देरी: आयोग के अधिकारियों के अनुसार, कई मामलों में पुलिस, शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग से समय पर जांच रिपोर्ट (Action Taken Report – ATR) न मिलने के कारण सुनवाई की तारीखें आगे बढ़ानी पड़ती हैं।
- दस्तावेजी कमियां: आवेदकों और शिकायतकर्ताओं द्वारा समय पर आवश्यक दस्तावेज और शपथ पत्र प्रस्तुत न करना भी प्रकरणों के समय पर बंद न होने की बड़ी वजह है।
आयोग का कड़ा रुख: ‘स्पेशल ड्राइव’ चलाकर निपटाए जाएंगे केस
मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों ने स्पष्ट किया है कि 431 लंबित मामलों के त्वरित निस्तारण (Expeditious Disposal) के लिए विशेष जनसुनवाई शिविर (Special Hearing Drives) आयोजित किए जाएंगे। आयोग ने जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को पत्र लिखकर निर्देश दिए हैं कि बाल अधिकारों से जुड़े संवेदनशील मामलों में 15 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से रिपोर्ट भेजी जाए, ताकि पीड़ित बच्चों को समय पर न्याय और पुनर्वास का लाभ मिल सके।












