भारत के सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्याय व्यवस्था में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव किया है। कोर्ट ने 18 मार्च 2026 को एक नया और सख्त सर्कुलर जारी किया है, जिसमें मुकदमों की तारीख (Adjournment) लेने के नियमों को पहले से कहीं अधिक कठोर बना दिया गया है। अब वकीलों और पक्षकारों को केवल असाधारण परिस्थितियों में ही अदालत से अगली तारीख मिल सकेगी।
क्यों उठाया गया यह कदम?
देश की अदालतों में लंबित मामलों की भारी संख्या इस फैसले की सबसे बड़ी वजह है। जनवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में 92,800 से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि देशभर की अदालतों में कुल 5 करोड़ से ज़्यादा मामले अटके पड़े हैं। बार-बार तारीखें लेने की पुरानी परंपरा इस बैकलॉग की सबसे बड़ी वजहों में से एक रही है।
क्या कहता है नया सर्कुलर?
यह सर्कुलर भारत के मुख्य न्यायाधीश के निर्देशन में जारी किया गया है और यह नवंबर तथा दिसंबर 2025 में जारी दो पुराने सर्कुलरों की जगह लेता है।
नए नियमों की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
1. सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में मिलेगी तारीख नया सर्कुलर स्पष्ट करता है कि तारीख केवल “असाधारण परिस्थितियों” जैसे — परिवार में किसी की मृत्यु, वकील या पक्षकार की गंभीर बीमारी, या किसी अन्य वास्तविक और ठोस कारण पर ही दी जाएगी। सुविधा न होना, तैयारी की कमी या शेड्यूल टकराव जैसे सामान्य बहाने अब मान्य नहीं होंगे।
2. अग्रिम सूचना देना अनिवार्य तारीख मांगने से पहले अर्जी की एक प्रति दूसरे पक्ष को पहले से दी जानी जरूरी है और सुनवाई के एक कार्यदिवस पहले सुबह 11 बजे तक सर्विस का प्रमाण देते हुए अर्जी दाखिल करनी होगी।
3. नए मामलों में सिर्फ एक बार मिलेगी तारीख नए (Fresh) मामलों में तारीख की अर्जी केवल एक बार ही स्वीकार की जाएगी, यानी बार-बार मामले को टालने का रास्ता बंद कर दिया गया है।
4. लगातार दो तारीखें नहीं किसी भी पक्ष द्वारा लगातार दो तारीखें नहीं ली जा सकतीं — इसके लिए मामले को पहले कोर्ट के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करना अनिवार्य होगा।
5. चार सप्ताह में सुनवाई अनिवार्य जिन मामलों में तारीख दी जाए, उन्हें अगले चार सप्ताह के भीतर अनिवार्य रूप से कोर्ट के सामने सूचीबद्ध करना होगा। साथ ही, तारीख मिलने के बाद आगे की तारीख मांगने की अनुमति नहीं होगी।
6. निर्धारित ईमेल और फॉर्मेट जरूरी सभी अर्जियां एक तय फॉर्मेट में और एक निर्धारित ईमेल आईडी के जरिए जमा करनी होंगी, और उनमें पहले ली गई तारीखों की संख्या का उल्लेख करना अनिवार्य होगा।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह सर्कुलर न्याय व्यवस्था को तेज़ और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक साहसी कदम है। न्याय में देरी को “न्याय से वंचित” करने के समान माना जाता है और इस नए ढांचे से आम लोगों को जल्दी न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रवैया देश की न्यायिक प्रणाली को जवाबदेह और कुशल बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि निचली अदालतें भी इस दिशा में कदम उठाती हैं या नहीं।

















