मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए यूजीसी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि नए नियम “काफी व्यापक” (Too Sweeping) हैं और समाज को विभाजित करने की क्षमता रखते हैं।
| सवाल (CJI’s Questions) | विवरण/तर्क |
| भेदभाव की परिभाषा पर | जब ‘भेदभाव’ की सामान्य परिभाषा मौजूद है, तो ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को अलग से परिभाषित करने की क्या जरूरत थी? |
| सामाजिक विभाजन | क्या ये नियम समाज को जोड़ने के बजाय कैंपस में जातियों के बीच दरार पैदा नहीं करेंगे? |
| रैगिंग का मुद्दा | नए नियमों के ढांचे से रैगिंग (Ragging) जैसे गंभीर विषय को बाहर क्यों रखा गया है? |
| पिछड़ापन और प्रगति | “आजादी के इतने वर्षों बाद हम जातिमुक्त समाज की ओर जा रहे थे, क्या अब हम प्रतिगामी (Regressive) बन रहे हैं?” |
| पृथक्करण (Segregation) | क्या हम कैंपस में अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल जैसा माहौल बनाना चाहते हैं? कृपया ऐसा न करें! |
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस मामले की अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक यूजीसी के 2012 वाले पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।
सुनवाई के मुख्य बिंदु:
- समिति का सुझाव: कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सुझाव दिया कि इन नियमों की समीक्षा के लिए प्रख्यात न्यायविदों (Eminent Jurists) की एक समिति बनाई जानी चाहिए जो सामाजिक मूल्यों और वास्तविकता को समझती हो।
- संविधान का हवाला: याचिकाकर्ताओं (विनीत जिंदल और अन्य) ने तर्क दिया कि नियमों का सेक्शन 3(c) केवल आरक्षित वर्ग को पीड़ित मानता है, जो अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस तर्क में “प्रथम दृष्टया” (Prima Facie) वजन पाया।
- अगली तारीख: मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 19 मार्च 2026 को तय की गई है। तब तक यूजीसी को अपनी परिभाषाओं और प्रावधानों पर पुनर्विचार करने का समय दिया गया है।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप उन लाखों छात्रों और शिक्षाविदों के लिए बड़ी राहत है जो इन नियमों को “भेदभावपूर्ण” और “जटिल” मान रहे थे। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों में “समानता” के नाम पर सामाजिक ताने-बाने को नुकसान नहीं पहुँचाया जा सकता।
















