देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में ‘जहरीला पानी कांड’ थमता नजर नहीं आ रहा है। कई इलाकों में दूषित पानी पीने से हुई मौतों और सैकड़ों लोगों के बीमार होने के बावजूद, प्रशासन अब तक स्थाई समाधान नहीं निकाल पाया है। प्रभावित इलाकों के लोग आज भी नल कनेक्शन की जगह नगर निगम के टैंकरों से पानी भरने को मजबूर हैं, लेकिन त्रासदी ऐसी है कि अब उन्हें टैंकर के पानी से भी डर लगने लगा है।
मजबूरी और खौफ का दोहरा वार
प्रशासनिक दावों के उलट, जमीनी हकीकत यह है कि कई बस्तियों में अब भी ड्रेनेज का पानी पेयजल लाइनों में मिल रहा है। लोगों का कहना है कि जब तक पूरी पाइपलाइन नहीं बदली जाती, वे नलों से पानी लेने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। विकल्प के तौर पर आ रहे टैंकरों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। लोगों को संदेह है कि टैंकरों में भरा जाने वाला पानी कहाँ से आ रहा है और क्या वे स्रोत सुरक्षित हैं?
प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए पानी पीना अब प्यास बुझाने की क्रिया नहीं, बल्कि एक जानलेवा जोखिम जैसा बन गया है। टैंकरों के सामने सुबह से ही कतारें लग जाती हैं, लेकिन वहां मौजूद महिलाओं का कहना है कि टैंकर का पानी भी अक्सर मटमैला या बदबूदार होता है।
निवासियों की मुख्य चिंताएं:
- अज्ञात स्रोत: लोगों को यह नहीं पता कि निगम किन कुओं या बोरवेल से टैंकर भर रहा है।
- संक्रमण का डर: पिछले दिनों हुई मौतों के बाद, ज़रा सा पेट दर्द या बुखार भी लोगों को दहशत में डाल देता है।
- आर्थिक बोझ: जो लोग सक्षम हैं, वे निजी तौर पर ‘कैम्पर’ या बोतल बंद पानी खरीदने को मजबूर हैं, लेकिन गरीबों के पास टैंकर का असुरक्षित पानी पीने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
इंदौर नगर निगम (IMC) के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि शहर के पुराने इलाकों में वॉटर सप्लाई और ड्रेनेज लाइनें एक-दूसरे के बेहद करीब और जर्जर हो चुकी हैं। जब तक युद्ध स्तर पर बुनियादी ढांचे का कायाकल्प नहीं किया जाता, तब तक टैंकरों से सप्लाई करना केवल एक ‘बैंड-एड सॉल्यूशन’ (अस्थाई उपचार) ही रहेगा। लोगों का गुस्सा अब सड़कों पर भी दिखने लगा है, क्योंकि स्वच्छ शहर का टैग उन्हें शुद्ध पानी की गारंटी नहीं दे पा रहा है।
















