भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री ने मुख्यमंत्री और संबंधित विभाग को पत्र लिखकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शिक्षा संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने की कोशिशें उनके मूल ढांचे को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
आमतौर पर अनुशासन के लिए जानी जाने वाली भाजपा में इस तरह का खुला विरोध दुर्लभ है। पूर्व मंत्री, जो स्वयं शिक्षा जगत से गहराई से जुड़े रहे हैं, का मानना है कि नया UGC बिल ‘अति-केंद्रीकरण’ (Over-centralization) का शिकार है।
पत्र के मुख्य अंश: उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल और पत्र में लिखा, “न्याय तभी सार्थक है, जब संस्थानों की स्वायत्तता (Autonomy) सुरक्षित रहे। शिक्षा को नौकरशाही के चंगुल में फंसने से बचाना होगा।” राजनीतिक मायने:
- सरकार बनाम संगठन: यह पत्र दर्शाता है कि सरकार के कुछ फैसलों पर पार्टी के पुराने और अनुभवी नेताओं की राय अलग है।
- विपक्ष को मिला मुद्दा: कांग्रेस ने इस मौके को लपकते हुए कहा है कि जब भाजपा के अपने नेता ही सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे, तो आम जनता का क्या होगा।
- संशोधन की उम्मीद: सूत्रों का कहना है कि इस विरोध के बाद सरकार बिल को ‘प्रवर समिति’ (Select Committee) को भेजने या कुछ विवादास्पद क्लॉज (Clauses) में बदलाव करने पर विचार कर सकती है।
निष्कर्ष: यह विरोध केवल एक बिल का नहीं, बल्कि वैचारिक मतभेद का भी प्रतीक है। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस अंदरूनी कलह को कैसे शांत करते हैं और क्या बिल में बदलाव किए जाते हैं।














