कभी भय और हिंसा की पहचान रहे बस्तर की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है। आज बस्तर डर नहीं, विकास, भरोसे और भविष्य का प्रतीक बन चुका है। इसी बदले हुए बस्तर की पहचान को और मजबूत करते हुए यह घोषणा की गई है कि 2026 का बस्तर ओलंपिक पूरी तरह नक्सलमुक्त बस्तर में आयोजित किया जाएगा।
यह घोषणा केवल एक खेल आयोजन की नहीं, बल्कि शांति, विश्वास और सामाजिक परिवर्तन की जीत का प्रतीक मानी जा रही है। सरकार और सुरक्षा बलों के संयुक्त प्रयासों से बस्तर के कई इलाकों में नक्सलवाद का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है। अब यहां स्कूल खुल रहे हैं, सड़कें बन रही हैं और युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं।
बस्तर ओलंपिक की शुरुआत ने पहले ही साबित कर दिया है कि खेल न केवल शरीर बल्कि समाज को भी मजबूत करता है। हजारों की संख्या में आदिवासी युवा, ग्रामीण खिलाड़ी और महिलाएं इसमें हिस्सा लेकर अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। खेल के मैदानों में आज जोश, आत्मविश्वास और सपनों की चमक साफ देखी जा सकती है।
2026 का बस्तर ओलंपिक नक्सलमुक्त क्षेत्र में आयोजित करने का निर्णय यह संदेश देता है कि अब बस्तर बंदूक की नहीं, खेल, शिक्षा और रोजगार की धरती बन रहा है। यह आयोजन देशभर को यह दिखाएगा कि बस्तर में शांति स्थायी है और यहां का युवा अब मुख्यधारा से जुड़ चुका है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जहां डर के कारण लोग घरों से बाहर नहीं निकलते थे, आज वहीं बच्चे खेल मैदानों में पदक जीतने के सपने देख रहे हैं।















